महंगाई का यू-टर्न: 4% के पार पहुंचा रिटेल इंफ्लेशन; RBI के सामने बड़ा धर्मसंकट, क्या महंगी होगी आपकी EMI?
नई दिल्ली: भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) के मोर्चे पर एक बार फिर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं. आम जनता को राहत मिलने के बजाय खुदरा महंगाई (Retail Inflation) ने एक बार फिर जोरदार वापसी की है और इसके आंकड़े 4 फीसदी के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गए हैं. महंगाई के इस यू-टर्न ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने एक नई धर्मसंकट की स्थिति पैदा कर दी है.
अब बाजार में सबसे बड़ा सवाल यह तैर रहा है कि क्या रिजर्व बैंक आगामी मॉनेटरी पॉलिसी (MPC) की बैठक में ब्याज दरों (Repo Rate) में बढ़ोतरी करेगा, या फिर आर्थिक रफ्तार को बनाए रखने के लिए दरों को जस का तस छोड़ देगा? आइए समझते हैं इस पूरी इकॉनमी का गणित.
कितना रहा रिटेल इंफ्लेशन? (आंकड़ों की जुबानी)
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, खाने-पीने की चीज़ें महंगी होने की वजह से खुदरा महंगाई दर में यह उछाल आया है.
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4% का आंकड़ा पार: जून महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गई. यह रिज़र्व बैंक के 4 प्रतिशत के मीडियन टारगेट (Target Midpoint) से ऊपर चली गई है.
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नई सीरीज़ का पहला झटका: यह पहली बार है जब इस साल जनवरी से लागू हुई नई सीरीज़ (जिसका बेस ईयर 2024 है) के तहत खुदरा महंगाई दर 4 प्रतिशत के स्तर के पार गई है. इससे पहले मई में यह 3.93 प्रतिशत पर थी.
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थाली पर मार: नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (NSO) द्वारा जारी CPI आंकड़ों के अनुसार, जून में खाद्य महंगाई दर पिछले महीने के 4.78 प्रतिशत से छलांग लगाकर 5.32 प्रतिशत पर पहुंच गई.
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ये चीजें रहीं सबसे महंगी: जून में सबसे ज़्यादा महंगाई वाली टॉप पांच चीजों में चांदी, सोना, हीरा और प्लेटिनम की ज्वेलरी के साथ-साथ अदरक, टमाटर, और किशमिश व मुनक्का शामिल रहे.
RBI के सामने क्या है बड़ा धर्मसंकट?
महंगाई के इस यू-टर्न से रिजर्व बैंक के सामने ‘कुआं और खाई’ जैसी स्थिति बन गई है:
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महंगाई पर लगाम (ब्याज दरें बढ़ाना): अगर केंद्रीय बैंक महंगाई को काबू में करने को प्राथमिकता देता है, तो उसे बाजार में लिक्विडिटी (पैसे के बहाव) को कम करने के लिए रेपो रेट (Repo Rate) में बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है.
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आर्थिक विकास की रफ्तार (दरें स्थिर रखना): दूसरी तरफ, अगर ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं, तो पर्सनल लोन, कार लोन और होम लोन महंगे हो जाएंगे. इससे आम कंज्यूमर्स की खर्च करने की क्षमता घटेगी, जिससे आर्थिक विकास (Economic Growth) की रफ्तार धीमी होने का जोखिम रहता है.
ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों को झटका: बाजार में लंबे समय से यह उम्मीद जताई जा रही थी कि अगर महंगाई काबू में रही, तो RBI रेपो रेट में कटौती करके आम जनता को लोन और EMI पर राहत देगा. लेकिन आंकड़ों के 4 फीसदी के पार जाते ही इस उम्मीद पर फिलहाल पानी फिरता नजर आ रहा है.
आम जनता और आपकी जेब पर क्या होगा असर?
अगर रिजर्व बैंक महंगाई के दबाव में आकर सख्त रुख अपनाता है, तो आम उपभोक्ताओं पर इसका सीधा असर पड़ेगा: महंगाई का यू-टर्न: 4% के पार पहुंचा रिटेल इंफ्लेशन; RBI के सामने बड़ा धर्मसंकट, क्या महंगी होगी आपकी EMI?
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लोन और EMI में राहत नहीं: मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह साफ है कि आने वाले कुछ महीनों तक होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन की EMI कम होने के कोई आसार नहीं हैं.
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दरें बढ़ने का खतरा: यदि अगली तिमाही में भी महंगाई इसी तरह बढ़ती रही, तो बैंक कर्ज पर ब्याज दरें बढ़ा भी सकते हैं, जिससे आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.
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फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर फायदा: कर्जदारों के लिए भले ही यह बुरी खबर हो, लेकिन सीनियर सिटीजंस और FD में निवेश करने वालों के लिए यह राहत की बात हो सकती है, क्योंकि ब्याज दरें ऊंची बनी रहने से FD पर रिटर्न अच्छा मिलता रहेगा.
इन दो अनिश्चितताओं पर टिकी है नजरें
आर्थिक जानकारों के मुताबिक, आगे की राह इन दो बड़े फैक्टर्स पर निर्भर करेगी:
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कच्चा तेल (Crude Oil): पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव जारी है. तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट और उत्पादन खर्च बढ़ेगा, जो महंगाई को और स्थायी बना सकता है.
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मानसून (Monsoon): देश के कई इलाकों में बारिश असमान रही है, जिससे खरीफ की बुआई प्रभावित होने की आशंका है. हालांकि, बेहतर बफर स्टॉक और मजबूत सप्लाई-चेन मैनेजमेंट की वजह से भारत की खाद्य महंगाई अब एक दशक पहले की तुलना में मानसून पर कम निर्भर है, फिर भी कृषि उत्पादन कम होने पर खाद्य महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती है.
एक्सपर्ट्स का क्या है मानना?
अधिकांश आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि RBI तुरंत ब्याज दरों में बढ़ोतरी का फैसला नहीं लेगा. केंद्रीय बैंक अभी ‘वेट एंड वॉच’ (देखो और इंतजार करो) की नीति अपना सकता है. हालांकि, दरों में कटौती की संभावना अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी है और सख्त मौद्रिक रुख (Hawkish Stance) आगे भी जारी रहने की उम्मीद है. अब सबकी नजरें रिजर्व बैंक की अगली पॉलिसी मीटिंग पर टिकी हैं.
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