Friday, May 15, 2026
Latest:
LatestFEATUREDkatniमध्यप्रदेशराष्ट्रीय

थदड़ी पर्व की तैयारी शुरू: आज कोकी लोले चोपे पकाए जाएंगे, कल बांसी भोजन से मनेगा शीतला माता का सिंधी पर्व सतहं, जानि‍ए कहानी

थदड़ी पर्व की तैयारी शुरू: आज कोकी लोले चोपे पकाए जाएंगे, कल बांसी भोजन से मनेगा शीतला माता का सिंधी पर्व सतहं किसी भी धर्म के त्योहार और संस्कृति उसकी पहचान होते हैं। त्योहार उत्साह, उमंग व खुशियों का ही स्वरूप हैं। लगभग सभी धर्मों के कुछ विशेष त्योहार या पर्व होते हैं जिन्हें उस धर्म से संबंधित समुदाय के लोग मनाते हैं। ऐसा ही पर्व है सिंधी समाज का ‘थदड़ी’। थदड़ी शब्द का सिंधी भाषा में अर्थ होता है ठंडी, शीतल…।
रक्षाबंधन के सातवें दिन , हरठद के दूसरे दिन यानी  सतहं  के नाम से  इस पर्व को समूचा सिंधी समुदाय हर्षोल्लास से मनाता है। इसी क्रम में कटनी में सिंन्‍धी समुदाय के सभी महिलाओं ने सहतं पर्व मनाया जाएगा।

आज से हजारों वर्ष पूर्व मोहन जोदड़ो की खुदाई में माँ शीतला देवी की प्रतिमा निकली थी। ऐसी मान्यता है कि उन्हीं की आराधना में यह पर्व मनाया जाता है। थदड़ी पर्वको लेकर तरह-तरह की कई कहानियां हैं।

शीतला माता का पर्व सतहं

कहते हैं कि पहले जब समाज में प्राकृतिक घटनाओं को दैवीय प्रकोप माना जाता था। जैसे समुद्रीय तूफानों को जल देवता का प्रकोप, सूखाग्रस्त क्षेत्रों में इंद्र देवता की नाराजगी समझा जाता था। इसी तरह जब किसी को माता (चेचक) निकलती थी तो उसे दैवीय प्रकोप से जोड़ा जाता था तब देवी को प्रसन्न करने हेतु उसकी स्तुति की जाती थी और थदड़ी पर्व मनाकर ठंडा खाना खाया जाता था। आज भी इस परंपरा को पूरे विश्‍वास के साथ पालन किया जाता है।
हरछठ के दिन सभी महिलाओं ने तारा डूबने के पहले  तरह-तरह के व्यंजन बनाए जा रहे हैं । जैसे कूपड़, गच, कोकी, सूखी तली हुई सब्जियाँ- भिंडी, करेला, आलू, रायता, दही-बड़े, मक्खन आदि। आटे में मोयन डालकर शक्कर की चाशनी से आटा गूँथकर कूपड़ बनाए जाते हैं ।
मैदे में मोयन और पिसी इलायची व पिसी शक्कर डालकर गच का आटा गूँथा जाता है। अब मनचाहे आकार में तलकर गच तैयार किए । रात को सोने से पूर्व चूल्हे पर जल छिड़क कर हाथ जोड़कर पूजा की जाती है । इस तरह चूल्हा ठंडा किया जाता है।
sindhi thadadi thali

ब्राम्‍हणी के घर में प्रार्थना 

सतहं सप्‍तमी के  दिन पूरा दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है एवं एक दिन पहले बनाया ठंडा खाना ही खाया जाता है। इसके पहले परिवार के सभी सदस्य किसी नदी, नहर, कुएँ या बावड़ी पर इकट्‍ठे होते हैं वहाँ माँ शीतला देवी की विधिवत पूजा । इसके बाद बड़ों से आशीर्वाद लेकर प्रसाद ग्रहण किया । बदलते दौर में जहाँ शहरों में सीमित साधन व सीमित स्थान हो गए हैं। ऐसे में पूजा का स्वरूप भी बदल गया है।  अब कुएँ, बावड़ी व नदियाँ अपना अस्तित्व लगभग खो बैठे हैं। इसलिए अब ब्राम्‍हणी के  घरों में ही पानी के स्रोत जहाँ पर होते हैं वहाँ पूजा की जाती है। इस पूजा में घर के छोटे बच्चों को विशेष रूप से शामिल हुए और माँ का स्तुति गान कर उनके लिए दुआ माँगी  कि वे शीतल रहें व माता के प्रकोप से बचे रहें। इस दौरान ये पंक्तियाँ गाई ।
chope koki
ठार माता ठार पहिंजे बच्चणन खे ठार
माता अगे भी ठारियो तई हाणे भी ठार…

Ashutosh shukla

30 वर्षों से निरन्तर सकारात्मक पत्रकारिता, संपादक यशभारत डॉट काम