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देश के वैज्ञानिकों की बड़ी कामयाबी: IIT बॉम्बे, IISER पुणे और कोलकाता ने खोजी हाई कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने की नई तकनीक

देश के वैज्ञानिकों की बड़ी कामयाबी: IIT बॉम्बे, IISER पुणे और कोलकाता ने खोजी हाई कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने की नई तकनीक

देश के वैज्ञानिकों की बड़ी कामयाबी: IIT बॉम्बे, IISER पुणे और कोलकाता ने खोजी हाई कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने की नई तकनीक

हेल्थ डेस्क: आज के समय में खराब लाइफस्टाइल और अस्वस्थ खानपान के कारण हाई कोलेस्ट्रॉल (विशेषकर LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल) एक गंभीर वैश्विक समस्या बन चुका है। शरीर में इसका बढ़ना सीधे तौर पर हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी दिल की बीमारियों के खतरे को बढ़ा देता है।

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए भारत के शीर्ष संस्थानों—IIT बॉम्बे, IISER पुणे और IISER कोलकाता के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक क्रांतिकारी तकनीक विकसित की है। यह नई खोज शरीर में फैट और खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने में गेम-चेंजर साबित हो सकती है।

क्या है यह नया तरीका और कैसे काम करता है?

वैज्ञानिकों ने इस शोध में ‘KTDP’ नाम का एक छोटा पेप्टाइड (Peptide) विकसित किया है। यह तकनीक शरीर के भीतर कोलेस्ट्रॉल बनने की प्रक्रिया को जड़ से प्रभावित करती है:

 मौजूदा इलाज से कितनी अलग और बेहतर है यह तकनीक?

आमतौर पर आज के समय में हाई कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने के लिए मरीजों को जीवनशैली में बदलाव, सख्त डाइट और ‘स्टैटिन’ (Statin) जैसी दवाओं का सहारा लेना पड़ता है।

  • मौजूदा दवाएं खून में पहले से मौजूद कोलेस्ट्रॉल को कम करने या उसके बनने की गति को धीमा करने पर काम करती हैं।

  • इसके विपरीत, यह नई पेप्टाइड तकनीक फैट के परिवहन (Transport System) को ही ब्लॉक कर देती है, जिससे यह अधिक सटीक और प्रभावी साबित हो सकती है।देश के वैज्ञानिकों की बड़ी कामयाबी: IIT बॉम्बे, IISER पुणे और कोलकाता ने खोजी हाई कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने की नई तकनीक

मरीजों तक कब पहुंचेगा यह इलाज?

रिसर्चर्स का मानना है कि भविष्य में यह तरीका दिल की बीमारियों के जोखिम को काफी हद तक कम कर देगा। हालांकि, आम लोगों के इलाज के लिए इसे उपलब्ध होने में अभी थोड़ा समय लगेगा:

  • परीक्षणों के दौर से गुजरेगी तकनीक: चिकित्सा विज्ञान के नियमों के अनुसार, किसी भी नई खोज या तकनीक को मरीजों तक पहुंचाने से पहले कई कड़े चरणों के क्लीनिकल ट्रायल्स (मानव परीक्षणों) से गुजरना पड़ता है।

  • सुरक्षा और प्रभावशीलता के सभी मानकों पर खरा उतरने के बाद ही इसे बाजार में दवा या थेरेपी के रूप में उतारा जा सकेगा। फिर भी, भारतीय वैज्ञानिकों की यह सामूहिक खोज भविष्य के सुरक्षित इलाज की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

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