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सरगुजा के 80 स्कूलों में ‘तालाबंदी’ जैसी नौबत- चपरासी हटाए गए, अब गुरुजी के हाथों में आई ‘झाड़ू और चाबी

सरगुजा के स्कूलों में संकट: संलग्नीकरण समाप्त होने से 80 हाईस्कूलों में एक भी भृत्य नहीं बचा; शिक्षक खुद खोल-बंद रहे ताले

सरगुजा के 80 स्कूलों में ‘तालाबंदी’ जैसी नौबत- चपरासी हटाए गए, अब गुरुजी के हाथों में आई ‘झाड़ू और चाबी

अंबिकापुर: छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के सरकारी स्कूलों से एक बेहद हैरान करने वाली और चिंताजनक व्यवस्था सामने आई है। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा ‘संलग्नीकरण’ (Attachment) समाप्त करने के एक कड़े आदेश के बाद जिले के 80 हाईस्कूलों में चतुर्थ श्रेणी (भृत्य/चपरासी) का एक भी कर्मचारी नहीं बचा है।

इस प्रशासनिक फैसले का सीधा असर अब स्कूलों की दैनिक व्यवस्था पर पड़ रहा है। अब इन स्कूलों में सुबह ताला खोलने से लेकर शाम को स्कूल बंद करने, पानी की व्यवस्था करने और साफ-सफाई तक की पूरी जिम्मेदारी वहां पदस्थ शिक्षक-शिक्षिकाओं के कंधों पर आ गई है।

 आत्मानंद जैसे बड़े उत्कृष्ट स्कूलों में भी गहराया संकट

इस आदेश की मार केवल सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों पर ही नहीं, बल्कि जिले के प्रतिष्ठित और बड़े सरकारी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों पर भी पड़ी है:

  • ब्रह्मपारा (अंबिकापुर): स्वामी आत्मानंद शासकीय उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यम विद्यालय।

  • केशवपुर: स्वामी आत्मानंद स्कूल।

  • सोहगा: स्वामी आत्मानंद स्कूल।

500 से अधिक छात्र, व्यवस्था शून्य:

खास बात यह है कि इन तीनों बड़े उत्कृष्ट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 500 से भी अधिक है। इतने बड़े पैमाने पर संचालित होने वाले इन संस्थानों में अब चतुर्थ श्रेणी का कोई स्टाफ नहीं बचा है। ऐसे में प्रतिदिन स्कूल के कमरों, शौचालय की सफाई, पीने के पानी की व्यवस्था और रोज समय पर स्कूल का ताला खोलने-बंद करने जैसी बुनियादी जरूरतें कैसे पूरी होंगी, इसे लेकर स्कूल प्रबंधन और प्राचार्यों की चिंताएं सातवें आसमान पर हैं।

क्या होता है संलग्नीकरण और क्यों बिगड़ी बात?

  • क्या था संलग्नीकरण? अमूमन जिन स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की कमी होती थी, वहां प्रशासनिक स्तर पर दूसरे विभागों या अतिरिक्त स्टाफ वाले स्कूलों से कर्मचारियों को अस्थाई रूप से ‘संबद्ध’ (Attach) कर दिया जाता था ताकि स्कूल का कामकाज न रुके।

  • आदेश का असर: शासन द्वारा संलग्नीकरण समाप्त कर सभी संबद्ध कर्मचारियों को उनके मूल स्थापना (मूल विभाग/स्कूल) में वापस भेज दिए जाने के कारण एक झटके में इन 80 हाईस्कूलों में स्टाफ का वैक्यूम (खालीपन) पैदा हो गया।

 शिक्षण कार्य छोड़कर साफ-सफाई की चिंता में डूबे शिक्षक

स्कूलों के प्राचार्यों और शिक्षकों का कहना है कि उनका मुख्य काम बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है। परंतु, अब स्टाफ न होने के कारण उन्हें पढ़ाई की चिंता छोड़कर सुबह जल्दी आकर स्कूल के ताले खोलने पड़ रहे हैं और दिनभर की अन्य व्यवस्थाओं की देखरेख करनी पड़ रही है। इस अव्यवस्था से स्कूलों के शैक्षणिक माहौल पर भी विपरीत असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए क्या इन खाली पदों पर जल्द ही नई नियुक्तियां करता है या फिर कोई वैकल्पिक व्यवस्था लागू की जाती है।

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