टमाटर-गोभी की कीमतें हुई आधी से भी कम, किसानों को भाव नहीं मिलने से पशुओं को खिलाने को मजबूर। नए वर्ष में ठंड का असर बढ़ने से साग-सब्जियों के भावों में कमी आने लगी है। कुछ माह पूर्व तक अपने रंग अनुरुप सुर्ख भावों को लेकर हमेशा चर्चा में रहने वाला टमाटर अब बेभाव हो चुका है। हालत यह है कि स्थानीय सब्जी मंडी में भाव नहीं मिल रहे हैं।
टमाटर-गोभी की कीमतें हुई आधी से भी कम, किसानों को भाव नहीं मिलने से पशुओं को खिलाने को मजबूर
ऐसे में लागत व परिवहन का खर्च भी नहीं निकलने पर किसान अपनी फसल मवेशियों को खिलाने को मजबूर हो रहे हैं। क्षेत्र के किसान टमाटर के साथ ही फूल गोभी के भी भाव नहीं मिलने पर मवेशियों को खिला रहे हैं।
मवेशियों को खिलाने को मजबूर
सेगांव के किसान राधेश्याम गेहलोत ने बताया कि खेत में टमाटर लगाए थे। उत्पादन भी अच्छा निकल रहा है, लेकिन मंडियों में भाव नहीं मिलने से लागत निकालना तो दूर, मंडी तक उपज ले जाने का परिवहन महंगा पड़ने लगा है। ऐसे में खेत से निकली फसल को मवेशियों को खिलाने को मजबूर हो रहे हैं।
मवेशियों को खिलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं
किसानों के अनुसार जब टमाटर के भाव बढ़ते है तो देश-प्रदेश में खासा हल्ला मचाया जाता है, लेकिन जब भाव औंधे मुंह गिरते है तो किसानों का पक्ष नहीं लेता। किसानों की मानें तो इस फसल के लिए शासन से न तो कोई अनुदान मिलता है और न ही सब्जियों की तरह टमाटर पर एमएसपी लागू है।
ऐसे में सीजन में कई बार टमाटर सहित अन्य सब्जियां बेभाव बिकने से किसानों के सामने अपनी उपज को फेंकने की बजाय मवेशियों को खिलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता।
उत्पादन पर अनुदान नहीं, प्रोसेसिंग पर अनुदान
किसानों के अनुसार अभी टमाटर के भाव बेभाव हो गए है। शासन टमाटर पर कोई अनुदान नहीं देती, लेकिन टमाटर का केचअप बनाकर बेचने वाले उद्योग पर 50 फीसदी तक अनुदान देती है।
किसान के एक किलो टमाटर की आज 10 रुपये कीमत नहीं है, लेकिन बाजार में 100 ग्राम केचअप इससे अधिक राशि में बिकता है। हालांकि शासन किसानों को कैचअप उद्योग के लिए प्रोत्साहित कर रही है, लेकिन क्षेत्र में उद्योग-कारखाने नहीं होने से किसानों को इसका वाजिब लाभ नहीं मिल पाता।
खरीददार नहीं मिल रहे
किसान मंसाराम पंचोले के अनुसार जिल के कई गांवों में किसान टमाटर की खेती करते है। वर्तमान में इसका भाव औंधे मुंह गिरने से मंडियों में खरीदार नहीं मिल रहे है। वहीं जो भाव दिए जा रहे हैं, वो किसानों की फसल की लागत अनुरूप नहीं है।

