Jabalpur Police News: ‘अपराधिक केस में बरी होने का मतलब यह नहीं कि नौकरी वापस मिले’, महिला से अभद्रता करने वाले बर्खास्त पुलिसकर्मी की याचिका खारिज
MP High Court: 'अपराधिक केस में बरी होने का मतलब यह नहीं कि नौकरी वापस मिले', महिला से अभद्रता करने वाले बर्खास्त पुलिसकर्मी की याचिका खारिज

Jabalpur Police News: ‘अपराधिक केस में बरी होने का मतलब यह नहीं कि नौकरी वापस मिले’, महिला से अभद्रता करने वाले बर्खास्त पुलिसकर्मी की याचिका खारिज
जबलपुर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पुलिस बल में अनुशासन और महिला सुरक्षा को लेकर एक बेहद सख्त और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक खोत की एकलपीठ ने रीवा पुलिस लाइन के बर्खास्त आरक्षक (कॉन्स्टेबल) रामफल अहिरवार की सेवा में बहाली की याचिका को सिरे से निरस्त कर दिया है। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि एक अनुशासित बल के सदस्य द्वारा महिला के साथ चाकू की नोक पर अभद्रता जैसा आचरण किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: ‘क्रिमिनल केस से बरी होना, बहाली का आधार नहीं’
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहा कि केवल आपराधिक मामले (Criminal Case) में संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) मिलने या बरी होने से विभागीय कार्रवाई स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। अदालत ने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच (Departmental Inquiry) और आपराधिक मुकदमे (Criminal Trial) के मानदंड और साक्ष्यों के मूल्यांकन के तरीके पूरी तरह अलग हैं।
क्या था पूरा मामला?
यह शर्मनाक घटना 10 जून, 2017 की है। रीवा में एक ऑटो में सफर कर रही युवती ने जब अपना स्कार्फ हटाने से इनकार कर दिया, तो सह-यात्री आरक्षक रामफल अहिरवार ने वर्दी की हनक दिखाते हुए जेब से चाकू निकाल लिया। आरक्षक ने युवती को चाकू दिखाकर न सिर्फ धमकाया, बल्कि उसके साथ घोर अभद्रता भी की। Jabalpur Police News: ‘अपराधिक केस में बरी होने का मतलब यह नहीं कि नौकरी वापस मिले’, महिला से अभद्रता करने वाले बर्खास्त पुलिसकर्मी की याचिका खारिज
एसपी ने किया था बर्खास्त, विभागीय जांच में दोषी
इस घटना के बाद रीवा के सिविल लाइंस थाने में आरक्षक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। इसके साथ ही पुलिस विभाग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आंतरिक विभागीय जांच भी शुरू की। जांच में आरक्षक पर लगे गंभीर आरोप पूरी तरह सिद्ध पाए गए, जिसके बाद तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (SP) ने 6 जून, 2018 को उसे सेवा से बर्खास्त (Dismiss) कर दिया था।
‘कदाचार सिद्ध, बर्खास्तगी का फैसला बिल्कुल सही’
बाद में निचली अदालत से अपराधिक केस में तकनीकी आधार (संदेह का लाभ) पर बरी होने के बाद, रामफल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी नौकरी वापस मांगी थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने विभागीय साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को देखने के बाद साफ किया कि आरक्षक का आचरण गंभीर कदाचार (Misconduct) की श्रेणी में आता है। ऐसे में तत्कालीन एसपी द्वारा लिया गया बर्खास्तगी का आदेश पूरी तरह से उचित और न्यायसंगत है।








