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10 साल मौन रहे तो अब कैसा न्याय?” जबलपुर हाईकोर्ट ने नगर निगम अधिकारियों की याचिका की खारिज

अधिकारों के लिए समय पर नहीं जागे तो नहीं मिलेगा न्याय" MP हाई कोर्ट का बड़ा फैसला; लेट-लतीफ कर्मचारियों को बताया 'Fence Sitter'

10 साल मौन रहे तो अब कैसा न्याय?” जबलपुर हाईकोर्ट ने नगर निगम अधिकारियों की याचिका की खारिज

जबलपुर : मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने सेवा संबंधी (Service Matters) मामलों में एक बेहद महत्वपूर्ण और नज़ीर पेश करने वाली टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अधिकारों की लड़ाई समय पर लड़ी जानी चाहिए।

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई कर्मचारी वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए चुप बैठता है और बाद में किसी अन्य कर्मचारी को मिली कानूनी राहत के आधार पर समान लाभ मांगने अदालत आता है, तो उसे कोई न्यायिक संरक्षण नहीं मिलेगा। अदालत ने ऐसे दावेदारों को ‘फेंस सिटर’ (Fence Sitter – अवसरवादी या दर्शक) की श्रेणी में रखा है।

10 साल बाद जगे याचिकाकर्ता, कोर्ट ने याचिका की खारिज

हाई कोर्ट ने जबलपुर निवासी नगर निगम के सहायक आयुक्त संभव मनु अयाची और अंकिता जैन की याचिका को खारिज कर दिया।

  • मामला क्या था? याचिकाकर्ता वर्ष 2016 से वरिष्ठता (Seniority) का लाभ मांग रहे थे।
  • कोर्ट का रुख: अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने लगभग 10 वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए कोई प्रभावी कानूनी कदम नहीं उठाया।
  • देरी की वजह: वर्ष 2023 में दिए गए अभ्यावेदन (Representation) को अदालत ने “नया कारण-ए-दावा” (New Cause of Action) मानने से साफ इनकार कर दिया।

 सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला: न्याय केवल सजग लोगों के साथ

न्यायालय ने अपने आदेश में उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा:

कोर्ट की मुख्य टिप्पणी:

“न्याय हमेशा समय पर कदम उठाने वालों के साथ खड़ा होता है। समानता का अधिकार, विलंब और लापरवाही की ढाल नहीं बन सकता। अधिकारों की रक्षा के लिए समय पर पहल जरूरी है, वरना अदालतें केवल इसलिए राहत नहीं देंगी कि किसी दूसरे को पहले उसका लाभ मिल चुका है।

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