शादी का हर अधूरा वादा दुष्कर्म नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खारिज की पीड़िता की अपील, 67 वर्षीय बुजुर्ग को बड़ी राहत

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बिलासपुर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पीड़िता की अपील याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास और न्यायमूर्ति सुधीर कुमार की युगल पीठ ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि सिर्फ शादी का वादा पूरा न होना अपने आप में दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक कि शुरुआत से ही गलत मंशा (छल-कपट) साबित न हो।

मामला क्या था?

पीड़िता, जो भिलाई की रहने वाली है और दो बच्चों (एक बेटा और एक बेटी) की मां है, अपने पति से अलग रह रही थी, हालांकि उनका कानूनी रूप से तलाक नहीं हुआ था।

  • पहचान और मेल-जोल: जून 2021 में जगदलपुर के ‘गुंजन संगीत समूह’ से जुड़ने के दौरान उसकी मुलाकात 67 वर्षीय हिमांशु झा से हुई।

  • आरोप: पीड़िता ने आरोप लगाया कि हिमांशु ने अपनी पत्नी की मृत्यु हो जाने की बात कहकर उसे शादी का प्रस्ताव दिया और अपने परिवार की सहमति लेने का आश्वासन दिया। इसके बाद दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने।

फास्ट ट्रैक कोर्ट का फैसला

मामले की सुनवाई के बाद जगदलपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) ने 4 दिसंबर 2025 को सभी साक्ष्यों और बयानों पर विचार करते हुए हिमांशु झा को दोषमुक्त (बरी) कर दिया था। इस बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ पीड़िता ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और फैसला

हाईकोर्ट की डबल बेंच ने मामले की विस्तृत समीक्षा करने के बाद पाया कि:

  • सहमति से संबंध: पीड़िता के बयानों से यह स्पष्ट हुआ कि दोनों के बीच पहली बार शारीरिक संबंध किसी दबाव या जबरदस्ती से नहीं बने थे, बल्कि वे लगभग 2-3 वर्षों तक आपसी सहमति से संबंध में रहे।
  • सहमति की प्रकृति: अदालत ने कहा कि साक्ष्य महिला की पूर्ण सहमति की ओर संकेत करते हैं।

  • कानूनी व्याख्या: पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “शादी का हर अधूरा वादा दुष्कर्म नहीं होता”। किसी संबंध के असफल होने या शादी न हो पाने का मतलब यह नहीं है कि शुरुआत से ही नीयत गलत थी।

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इन आधारों को देखते हुए उच्च न्यायालय ने निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के बरी करने के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया और पीड़िता की अपील खारिज कर दी।