धर्मांतरण और आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वालों को नहीं मिलेगा ‘पिछड़ा वर्ग’ आरक्षण का लाभ
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में मद्रास हाई कोर्ट के उस निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसमें धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को ‘पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम)’ के तहत आरक्षण का लाभ देने से इनकार कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल धर्म बदलने से किसी व्यक्ति को नए धर्म की पिछड़ा वर्ग सूची का हिस्सा नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश (GO) को भी रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा है।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के एक निवासी से शुरू हुआ था। एक हिंदू परिवार में जन्मे इस व्यक्ति ने वर्ष 2016 में इस्लामी रीति-रिवाज से विवाह किया और धर्मांतरण कर अपना नाम समीर अहमद रख लिया। इसके बाद 2015 में सुन्नत जमात से प्राप्त धर्म परिवर्तन प्रमाण पत्र के आधार पर उसने खुद को ‘मुस्लिम लेब्बई’ समुदाय (जो तमिलनाडु में पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में आता है) का बताते हुए कम्युनिटी सर्टिफिकेट/जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया।
जब स्थानीय तहसीलदार ने उसका यह आवेदन खारिज कर दिया, तो उसने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मद्रास हाई कोर्ट ने माना था कि धर्म परिवर्तन करने से कोई व्यक्ति केवल उस नए धर्म का अनुयायी बनता है, लेकिन उसे स्वतः ही उस धर्म के विशिष्ट पिछड़े वर्गों या जातियों में शामिल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के रुख को सही ठहराते हुए कहा कि आरक्षण का लाभ ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है। धर्म बदलने से व्यक्ति का जन्मजात सामाजिक पिछड़ापन खुद-ब-खुद नए धर्म की आरक्षित श्रेणी में स्थानांतरित नहीं होता।
फैसले का असर
इस फैसले से यह साफ हो गया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म (या अपनी मूल जाति श्रेणी) को छोड़कर इस्लाम या अन्य किसी गैर-हिंदू धर्म को अपनाता है, तो वह केवल धर्म बदलने के आधार पर नए धर्म में ‘पिछड़ा वर्ग’ (BC/OBC) के आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।












