बाद भी विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है इसके बारे में अब भी कम ही बातें सामने आ पाई हैं। उन्होंने ठीक हो चुके मरीजों को हो रही परेशानियों पर भी चिंता जताई है।
संयुक्त राष्ट्र। कोविड-19 से पूरी दुनिया को जूझते हुए 9 माह बीत गए हैं। पूरी दुनिया में इसके अब तक 37,736,965 मामले सामने आ चुके हैं और 1,078,572 मरीजों की मौत भी हो चुकी है। वहीं 26,428,408 मरीज ठीक भी हुए हैं। लेकिन ठीक होने के कई महीनों बाद भी मरीजों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उनको सांस लेने में दिक्कत हो रही है। कुछ मामलों में व्यक्ति को अधिक थकान हो रही है और कुछ दूसरी परेशानियां भी हो रही हैं। इस तरह के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इनको लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चिंता व्यक्त की है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रोस अधनम घेब्रेयसस का कहना है कि स्वास्थ्य जोखिमों के मद्देनजर कोविड-19 को बेकाबू नहीं होने दिया जा सकता है। संगठन के मुताबिक बीते कुछ दिनों में खासतौर पर यूरोप और अफ्रीका में संक्रमण के मामलों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। पिछले चार दिनों में हर दिन अब तक सबसे बड़ी संख्या में मामलों की पुष्टि हुई है। मरीजों को आईसीयू में भर्ती किए जाने के भी मामले इस दौरान तेजी से बढ़े हैं। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि फिलहाल कोविड-19 से लोगों की सेहत पर दीर्घकाल में होने वाले असर को समझने का प्रयास किया जा रहा है।
डब्ल्यूएचओ महासचिव का कहना है कि हाल के दिनों में इस जानलेवा वायरस पर चर्चा हुई है ताकि सामूहिक रूप से प्रतिरोधक क्षमता हासिल की जा सके। इस सिद्धांत का इस्तेमाल वैक्सीनेशन के लिये किया जा सकता है। यदि वैक्सीनेशन प्रोग्राम को शुरू कर दिया जाता है तो वायरस से काई लोगों की जान बचाई जा सकती है। उनका कहना है कि खसरा के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता के लिये 95 फीसदी जनसंख्या को वैक्सीन देना जरूरी है। ऐसा करने पर बाकी बचे पांच फीसदी लोग खुद ही प्रोटेक्टेड हो जाएंगे। वहीं पोलियो के लिये करीब 80 फीसद को दवा देनी होगी। घेब्रेयसस के मुताबिक हर्ड इम्युनिटी किसी वायरस से लोगों को बचाकर हासिल की जाती है, उन्हें संक्रमित बना कर नहीं। उनका ये भी कहना है कि इतिहास में इस तरह की रणनीति कभी इस्तेमाल नहीं की गई है। कोविड-19 से प्रतिरोधक क्षमता के बारे में अभी ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है।

