बड़े घरानों की यह सोच-बंटवारे को लेकर कोर्ट-कचहरी का टंटा न हो
भोपाल। जीते जी बच्चे झगड़ें नहीं। परिवार बिखरे नहीं। बंटवारे को लेकर कोर्ट-कचहरी का टंटा न हो। क्योंकि, सुमति है तो संपत्ति है। बड़े घरानों की यह सोच अब छोटे संयुक्त परिवारों में भी नजर आने लगी है। इन परिवारों के मुखिया घर की एकता को लेकर चिंतित हैं।
वे यह चाहते हैं उनके जीते जी जिस तरह परिवार में प्यार और एकता है, दुनिया से जाने के बाद भी परिवार अखंड बना रहे। यही कारण है, वे बच्चों के नाम गोपनीय वसीयत कर रहे हैं। वसीयत की जानकारी बच्चों को देते जरूर हैं लेकिन वह पंजीयन कार्यालय में जमा रहती है और उसका खुलासा जीवन उपरांत होता है।
पंजीयन कार्यालय के आंकड़े बताते हैं कि गोपनीय वसीयत की संख्या में इस साल काफी वृद्धि हुई है। रजिस्टर्ड वसीयतें हमेशा से होती रही हैं, लेकिन इनकी संख्या साल में 15- 20 हुआ करती थी। पिछले कुछ सालों में यह संख्या बढ़कर माह में करीब 25 के आसपास पहुंची।
वर्ष 2017-18 में इनकी संख्या प्रति 50 के करीब पहुंच चुकी है। दरअसल वसीयत एक कानूनी दस्तावेज है। जिसे उन व्यक्ति या व्यक्तियों के लिखा जाता है, जो लिखने वाले की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति और व्यवसाय को प्राप्त कर सकेंगे। वसीयत को लिखने वाला अपने जीवन में कभी भी निरस्त या बदल भी सकता है। एक स्पष्ट तरह से लिखी वसीयत परिवार में झगड़ा होने से बचाती है।
निर्णय से परिवार खुश है
साकेत नगर में रहने वाले जयराम (परिवर्तित नाम) ने 2014 में ही रजिस्टर्ड वसीयत कर रखी थी। उनके दो बेटे और एक बेटी होने के कारण उन्हें खतरा था कि वसीयत अगर सामने आ गई तो परिवार में विवाद होगा और बिखर जाएगा।
उन्होंने गोपनीय रूप से रजिस्टर्ड वसीयत कराकर सब रजिस्ट्रार ऑफिस में रख दिया। जब दिसंबर 2016 में उनकी मृत्यु हुई तब रजिस्ट्रार ऑफिस से वसीयत की कॉपी निकलवाई गई। जिसमें उन्होंने दोनों बेटे सहित अपनी बेटी को भी संपत्ति, मकान और बैंक बैलेंस को समान रूप से वितरित किया था। अब पूरा परिवार खुशहाल है।
बेटों में न हो झगड़ा
पंजाबी बाग में रहने वाले रिटायर्ड डीएसपी आलोक (परिवर्तित नाम) ने अपनी सभी संपत्ति का बंटवारा सामान रूप से करकर रजिस्टर्ड वसीयत कराई थी। उनके लीगल एडवाइजर से प्राप्त जानकारी के अनुसार उनकी दो संतानें थी।
जिसके चलते उन्हें संपत्ति के बंटवारे को लेकर हमेशा ही चिंता लगी रहती थी कि कहीं उनके जाने के बाद बेटों में संपत्ति को लेकर झगड़ा न हो जाए। इसके लिए उन्होंने न केवल संपत्ति का बंटवारा किया बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि कोई भी बेटा किसी दूसरे की संपत्ति में कोई अतिक्रमण न करें। अक्टूबर 2017 में उनकी मृत्यु हो गई और आज दोनों बच्चे अपने-अपने हिस्से को लेकर संतुष्ट हैं।
लगते हैं महज एक हजार रुपए
सादे कागज हस्ताक्षर के साथ लिखी गई वसीयत वैध होती है। लेकिन, रजिस्टर्ड वसीयत संदेह से बचाती है। ई-रजिस्ट्री कार्यालय में सुविधा भी है। महज एक हजार रूपए में रजिस्टर्ड वसीयत हो जाती है। रजिस्टर्ड वसीयत के लिए दो गवाहों के साथ सब-रजिस्ट्रार कार्यालय जाना होता है।
यहां वसीयत कर दस्तावेज को लॉकर में सुरक्षित रखा जाता है। समय-समय पर उसे देखा भी जा सकता है। व्यक्ति की मौत के बाद सबसे पहले रजिस्ट्रेशन कर संपत्ति को मालिकाना हक वाले व्यक्ति को सौंप दी जाती है। सेना के जवानों को अल्प समय के नोटिस पर वसीयत रजिस्टर्ड करवाने का विशेषाधिकार प्राप्त होता है।
जबकि आम लोगों को सभी औपचारिकताओं के साथ वसीयत पंजीकृत करवाना होती है। भारतीय पंजीकरण अधिनियम, 1908 में वसीयत को सुरक्षित रखने का प्रावधान है। वसीयतकर्ता का नाम या उसके एजेंट का नाम लिखा हुआ वसीयत का सीलबंद लिफाफा सुरक्षा के लिए किसी भी रजिस्ट्रार के पास जमा करवाया जा सकता है।
इनका कहना है
2005 में बेटी को भी संपत्ति में अधिकार देने का कानून बनाया गया था। जिसके चलते पुत्री भी पिता की संपत्ति पर अधिकार पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ सकती है। इसलिए रजिस्टर्ड वसीयत के मामले बढ़ रहे है ताकि परिवार में कोई झगड़ा न हो। – राजेंद्र बब्बर, सीनियर एडवोकेट, भोपाल
पिछले सालों के मुकाबले वर्तमान में रजिस्टर्ड वसीयत के मामले ज्यादा आ रहे है। एक माह में अब 50 के करीब लोग रजिस्टर्ड वसीयत करवा रहे है। रजिस्टर्ड वसीयत होने के फायदों के चलते इनकी संख्या अब बढ़ रही है।
– पवन अहिरवार, जिला पंजीयक, भोपाल

