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नई पीढी नही बनना चाहती मूर्तिकार

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जबलपुर। नवरात्र की षुरूआत में एक दिन बस षेष है, षहरवासी एक तरफ जहां घरों की साफ सफाई में व्यस्त है वही षहर के मूर्तिकार भी अपनी प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हुए है। दुर्गा पण्डालों में विराजित होेने वाली इन प्रतिमाओं में रंग रोगन का कार्य जारी है और मूर्तिकार समय रहते इन प्रतिमाओं को पूरा करने का प्रयास कर रहे है जो षहर और प्रदेष ही नही बल्कि देष के अन्य राज्यों उत्तर प्रदेष, गुजरात, बिहार में भी स्थापित होगी। षहर में जहां घमापुर, भानतलैया, दीक्षितपुरा, दमोहनाका, गौर आदि क्षेत्रों सहित बंगाल से आए कलाकार भी बंगाली बाडियांे में प्रतिमाओं का निर्माण कर रहे है।
महंगाई का असर
बढती मंहगाई ने इन मूर्तिकारों के उत्साह में पानी फेर दिया है मूर्तिकारों का कहना है कि प्रतिमाओं को निर्मित करने वाली सामग्रियां मिट्टी, रंग, सुतली, प्यारा अब मंहगा हो गया है, जिससे मूर्तियों के दाम भी बढ गए है। आमतौर पर जो मूर्ति पहले पांच हजार रूपयों में बनकर तैयार हो जाया करती थी अब उसी मूर्ति की कीमत पन्द्रह हजार तक जा पहुुंची है।
पूरा परिवार दे रहा सहयोग
नवरात्र कल से प्रारंभ हो जाएगा जिस कारण अब इन मूर्तिकारों के पास तय समय में मूर्ति तैयार कर उसे देना है जिसके चलते अब ये मूर्तिकार दिन रात मेहनत कर मूर्तियों को सजाने संवारने में जुटे हुए है इसमें इनके परिवार की महिलाएं और बच्चे भी भरपूर सहयोग कर रहे है।
नई पीढी नही बनना चाहती मूर्तिकार
षीतलामाई में मूर्ति निर्माण कार्य में लगे कैलाष प्रजापति का कहना है कि उनकी आने वाली पीढी इस कला को नही करना चाहती क्यूंकि इस कला से जीवन गुजर करना मुुष्किल होता है इनका कहना है कि वे स्वंय भी नही चाहते कि उनके बच्चें इस कला से जीवन यापन करे और तंगहाली की जिंदगी जिएं।
संस्कारधानी की है अलग पहचान
मूर्तिकला को लेकर संस्कारधानी की सारे देष में अलग पहचान है यही कारण है कि यहां निर्मित मूर्तियां की मांग देषभर में है और ये यहां के मूर्तिकारों की बनाई प्रतिमाएं देष के अन्य राज्यों में भी स्थापित की जाती है।

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