भोपाल। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं के मानदेय घोटाले की जांच कर क्लीनचिट दे चुके तीन अफसरों की जांच के लिए नई समिति बना दी गई है। यह समिति पुराने जांच प्रतिवेदनों का परीक्षण करेगी और संबंधितों के बयान लेकर राज्य शासन को रिपोर्ट सौंपेगी। मध्य प्रदेश के भोपाल सहित 14 जिलों में 26 करोड़ रुपये से अधिक के मानदेय घोटाले में अब बड़े अधिकारी फंसते दिखाई दे रहे हैं। पहली बार उन अधिकारियों की जांच के लिए समिति बनाई गई है, जिन्होंने मानदेय घोटाले की शिकायत को जांच में फर्जी बताकर आरोपितों को क्लीनचिट दे दी थी। भोपाल जिले की आठ बाल विकास परियोजनाओं में सबसे पहले घोटाला पकड़ में आया। यहां प्रदेश में सबसे ज्यादा साढ़े छह करोड़ का घोटाला हुआ है। मामले की शिकायत होने पर भोपाल की तत्कालीन संयुक्त संचालक स्वर्णिमा शुक्ला से जांच कराई गई। उन्होंने शिकायत को झूठा बताया। फिर महिला एवं बाल विकास संचालनालय में पदस्थ उप संचालक ज्योति श्रीवास्तव और फिर वित्त सलाहकार राजकुमार त्रिपाठी से जांच कराई गई। इन अधिकारियों ने भी शिकायत को ही झूठा ठहराकर आरोपितों को क्लीनचिट दे दी। जब प्रदेश के महालेखाकार ने मामला पकड़ा और नए सिरे से समिति बनाई गई। तब घोटाले की परतें खुलीं और एक-एक कर आरोपितों के चेहरे सामने आ गए। मामले में तीन लिपिकों को बर्खास्त किया जा चुका है, तो आठ परियोजना अधिकारी और दो लिपिक निलंबित हैं। उल्लेखनीय है कि जिम्मेदार अधिकारी एक महीने में दो बार आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं का मानदेय निकालते थे। इसमें से दूसरे बार की राशि अपने रिश्तेदार या परिचितों के बैंक खातों में जमा कराते थे। रमनवाल करेंगे जांच अपनी जांच में शिकायत को गलत ठहराने वाले और आरोपितों को क्लीनचिट देने वाले अधिकारियों की जांच अपर संचालक आरपी रमनवाल के नेतृत्व में प्रभारी वित्त सलाहकार एनके जोशी और सहायक संचालक सुबोध गर्ग करेंगे। इस समिति को 15 दिन में रिपोर्ट सौंपना है। हालांकि रिपोर्ट कब तक सौंपी जाएगी, यह क्लीनचिट देने वाली तीनों जांच समितियों के जांच प्रतिवेदन मिलने के बाद ही पता चलेगा। यदि प्रतिवेदन जल्दी मिल गए, तो समय से जांच रिपोर्ट सौंपी जा सकेगी। वरना, देरी तय है। इसके साथ ही यह भी तय है कि प्रतिवेदनों में यह पाया गया कि संबंधित अधिकारियों ने जानबूझकर सही जांच नहीं की है, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होना तय है।