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इस बार नर्मदा महोत्सव के बिना बीती शरदपूर्णिमा की यादगार रात्रि

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जबलपुर। कालगणना की नगरी उज्जैन के सुप्रसिद्व कालिदास महोत्सव, खजुराहो महितस्व, दमोह नोहटा के नृत्य महोत्सव सहित देश के विभिन्न महोत्सवों की कड़ी में संस्कारधानी जबलपुर का देश-दुनिया में चर्चित हो चुका ‘नर्मदा महोत्सव’ इस बार स्थगित रहा।

यह बात गीत-संगीत प्रेमियों को जमकर अखरी। लेकिन करें भी क्या? कोविड-19 ने इसी तरह एक के बाद एक कई खुशियों को पलीता लगाया है, सो नर्मदा महोत्सव भी नहीं हुआ। खैर! जीवन रहेगा तो आने वाले साल की शरदपूर्णिमा की रात फिर नर्मदा महोत्सव की सरगम से गुलज़ार हो जाएगी।

कुछ ऐसा ही विमर्श शरदपूर्णिमा की रजनी की चादर में विश्वप्रसिद्ध भेड़ाघाट पहुंचे सैलानियों के मुख से सुनने को मिली। यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हैरीटेज में शामिल भेड़ाघाट के विश्वप्रसिद्ध धुआंधार जलप्रपात के किनारे नर्मदा महोत्सव का रसपान करते हुए आसमान में उभरे शरदपूर्णिमा के पूर्णचन्द्र का दीदार वाकई कमाल होता था।

किंतु इस बार सुरीलापन नदारद रहा और निस्तब्धता के बीच ही कलकल निनादित पुण्यसलिला नर्मदा के जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रदेव का पूर्ण स्वरूप देखना पड़ा। अन्यथा हर साल हजारों की संख्या में जबलपुर, आसपास और देश-दुनिया के प्रकृति प्रेमी जबलपुर चले आते थे।

अब तक भारत के अनेक नामवर गीत-संगीत और नृत्य के बड़े हस्ताक्षर जबलपुर के नर्मदा महोत्सव के मुक्ताकाशी मंच पर दिलों को जीत चुके हैं। जब राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त बुलन्द आवाज के धनी मशहूर उद्घोषक प्रदीप दुबे की दिलकश आवाज गूंजती सब दिलों को थाम लेते थे, फिर होती थी गीतों की एक के बाद एक शानदार प्रस्तुति।

बहरहाल, इस बार पूरा था चन्द्रमा पर रात आधी, रह ही गई बात आधी। कोविड-19 तुमने खुशी को पूर्णिमा के दिन ग्रहण लगा ही दिया। अरे! इसके बावजूद जबलपुर की शान भेड़ाघाट तो कायम रहा, जिसने शरदपूर्णिमा की रात्रि सरगम विहीनता के दुख को चातुर्दिक सौंदर्य से सुख में बदला।

ओशो ने ठीक ही कहा था दुनिया में सबसे खूबसूरत यही जगह है। यहॉं से नर्मदा की जललहरी में शरदपूर्णिमा के चांद का नज़ारा जो एक बार ले ले उसका जीवन कृतार्थ हो जाता है, आंखों को सुकून मिलता है। बन्दरकूदनी वाला हिस्सा जब ऊपर से देखो तो ऊपर का पूरा चांद मुस्कुराहट बिखेर होंठों की मुस्कान में अमृतवर्षा वाली खीर की मिठास घोल देता है।

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