अभियुक्त के बयान को हल्के में न ले ट्रायल कोर्ट, धारा-313 के तहत दिया जाने वाला अवसर बेहद महत्वपूर्ण : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक फैसले में कहा है कि ट्रायल कोर्ट को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा -313 के तहत अभियुक्त द्वारा दिए गए
बयान को सावधानीपूर्वक परीक्षण करना चाहिए। कानून के तहत ट्रायल कोर्ट के लिए ऐसा करना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक फैसले में कहा है कि ट्रायल कोर्ट को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा -313 के तहत अभियुक्त द्वारा दिए गए बयान को सावधानीपूर्वक परीक्षण करना चाहिए। कानून के तहत ट्रायल कोर्ट के लिए ऐसा करना जरूरी है।
जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस कृष्णा मुरारी की पीठ ने अपने फैसले में कहा हैं कि मुकदमे के अंत में दर्ज किए गए अभियुक्त के बयान को हल्के ढंग से झूठा व अविश्वसनीय बताकर दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि अभियुक्त को धारा-313 के तहत दिया जाना यह अवसर बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसके जरिए उसे अपना बचाव करने और न्याय मांगने का अधिकार प्राप्त है। ट्रायल कोर्ट द्वारा अभियुक्त के बयान को निष्पक्ष तरीके से न लेने व बिना दिमागी कसरत किए उस पर विचार न करने से वह दोषी ठहराया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जहांअभियोजन पक्ष को संदेह से परे अपने मामले को साबित करने की आवश्यकता होती है वहीं इनके ठीक विपरीत अभियुक्तों को केवल उचित संदेह पैदा करने या वैकल्पिक थ्योरी को साबित करने की आवश्यकता होती है। यह अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह कैसे अभियुक्त के बचाव को काटे।








