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अब नहीं रहा नर्मदा का ‘अमृत’, मशहूर चित्रकार व साहित्यकार अमृतलाल बेगड़ का निधन

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जबलपुर । कलकल बहती अठखेलियां करती सौंदर्य की नदी नर्मदा के सौंदर्य को अपने कलाभाव और रचनात्मक कौशल से जनमानस के सामने लाने वाले साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित संस्कारधानी के गौरव और मां नर्मदा के पुत्र अमृतलाल बेगड़ का शुक्रवार की सुबह लम्बी बीमारी के बाद एक निजी अस्पताल में 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

श्री बेगड़ का अंतिम संस्कार नर्मदा तट ग्वारीघाट में सम्पन्न होगा। उनके निधन की खबर न सिर्फ जबलपुर वरन् प्रदेश के साथ-साथ पूरे साहित्य जगत के लिए झकझोर देने वाली है। 3 अक्टूबर 1928 को जन्मे श्री बेगड़ ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गुजरात के कच्छ जिले में प्राप्त की थी। उसके बाद वे फिर जबलपुर आ गए। कला की शिक्षा के लिए वे 1998 में पढ़ाई छोड़कर शांति निकेतन चले गए। जहां आचार्य नंदलाल के सान्निध्य में 5 वर्षों तक चित्रकला की शिक्षा ली और आर्ट में डिप्लोमा भी प्राप्त किया। वे अक्सर अपने गुरू एक बात कहा करते थे जिसमें वे बताते थे कि जीवन में भले ही सफल मत होना मगर अपना जीवन सार्थक बनाना। जिसे उन्होंने करके भी दिखाया। वे जीवनभर नर्मदा के लिए नर्मदा के साथ जिए। उनका जाना शहर के लिए अपूर्णीय क्षति है।

वैसे तो श्री बेगड़ की कृतियां किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। जिसके चलते उन्हें कई क्षेत्रीय व राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साहित्य के क्षेत्र में श्रेष्ठ माने जाने वाले साहित्य अकादमी पुरस्कार के साथ साथ वे मध्यप्रदेश शिखर सम्मान, शरद जोशी राष्ट्रीय सम्मान, शंकर दयाल शर्मा सृजन सम्मान, महापंडित राहुल संस्कृ त्यायन सम्मान, डॉ. विद्यानिवास मिश्र सम्मान, गुजरात साहित्य अकादमी पुरस्कार भी उन्हें प्राप्त हुए, इसके अलावा न कितने छोटे-बड़े सम्मान और नर्मदा को लेकर अनगिनत शोध व व्याख्यान उनके नाम दर्ज हैं।

हिन्दी, गुजराती में रचनाएं
अमृतलाल बेगड़ चित्रकार के साथ साथ लेखक भी थे। जिन्होंने गुजराती में 7 और हिन्दी में 3 पुस्तकें लिखीं। उनका लेखन पूरी तरह से नर्मदा पर केन्द्रित था। वे जीवन भर नर्मदा के संग ही जिए। उनकी मुख्य रचनाएं सौंदर्य की नदी नर्मदा, अमृतश्य नर्मदा, तीरे-तीरे नर्मदा रहीं। इसके साथ ही 8-10 पुस्तकें उन्होंने बाल साहित्य पर भी लिखीं। जिनकी पुस्तकें पांच भाषाओं में तीन संस्करणों के साथ प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही दो किताबों का विदेशी भाषा में भी अनुवाद हुआ है।

वैसे तो मध्यप्रदेश के साथ साथ गुजरात में नर्मदा के प्रति आस्था रखने वालों की कोई कमी नहीं है। और यही आस्था अमृतलाल बेगड़ के मन में भी थी। लेकिन उन्होंने सिर्फ आस्था तक अपने आप को बांधकर नहीं रखा। उन्होंने नर्मदा को पूरी तरह से जीया है। नर्मदा में बढ़ते प्रदूषण व लगातार नर्मदा के प्रवाह को रोककर बनाए जा रहे बांधों पर उन्होंने अपनी चिंता प्रकट की। जिसे उनके साहित्य में भी देखा जा सकता है। उनका मानना था कि नर्मदा जभी रहेगी जब उसके प्रवाह रहेगा। यदि उसके प्रवाह को रोका गया तो नर्मदा भी नहीं रहेगी। इसके साथ ही नर्मदा तट पर फैली संस्कृतियों और आध्यात्म दर्शन को भी उन्होंने अपने साहित्य के केन्द्र में रखा। उनके जाने से साहित्य जगत शोक संतृप्त है।

संस्कारधानी की संस्कृतिक विरासत थे श्री अमृत लाल बेगड़ः विवेक कृष्ण तन्खा

जबलपुर शहर के जाने माने चित्रकार, लेखक, साहित्यकार, नर्मदा भत श्री अमृत लाल बेगड के आकस्मिक निधन पर राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा द्वारा गहन शोक व्यक्त करते हुए कहा कि अमृत लाल बेगड का निधन होना मेरी व्यक्तिग क्षति है, उनसे मेरे पारिवारिक संबंध रहे है उनका मुझे हमेशा स्नेह व आर्शीवाद मिलता रहा है। वो सच्चे मायने में संस्कारधानी के सपूत थे। बैगड़ गुजराती एवं हिंदी भाषा के महान साहित्यकार थे, साथ ही एक जाने माने चित्रकार भी थे। उनके द्वारा रचित एक यात्रा सौन्दर्यनी नदी नर्मदा के लिए उन्हे साहित्य अकादमी पुरूस्कार से सम्मानित किया गया था। जो संस्कारधानी के लिए एक गौरव की बात है। उनके न रहने पर आज संस्कारधानी के साहित्यिक क्षेत्र में शून्यता सी आ गयी है। यह हमारे लिए अपूर्णीय क्षति है जिसे कभी पूरा नही किया जा सकेगा उनके निधन पर मै अपनी ओर से अपने परिवार की ओर से एवं कांग्रेसजनो की ओर से उनको श्रद्धाजंली अर्पित करता हूं। परमपिता परमेश्वर व मां नर्मदा से प्रार्थना करता हूं कि उन्हे अपने चरणों में स्थान दें।

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