छठी मैया की कथा और छठ पूजा का इतिहास: आस्था, पवित्रता और सूर्य उपासना का महापर्व छठ अब केवल बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। देश के कोने-कोने में श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से यह पर्व मनाते हैं। चार दिनों तक चलने वाले इस कठिन व्रत में भगवान सूर्य और छठी मैया की आराधना की जाती है। लेकिन आखिर छठी मैया कौन हैं? उनकी पूजा की शुरुआत कैसे हुई और महाभारत के कर्ण, द्रौपदी तथा माता सीता से इस पर्व का क्या संबंध है? इन सवालों के जवाब कई प्रचलित पौराणिक कथाओं और लोकमान्यताओं में मिलते हैं।
कौन हैं छठी मैया? जानिए छठी मैया की कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठी मैया को षष्ठी देवी के नाम से जाना जाता है। उन्हें संतान की रक्षा करने वाली, बच्चों को दीर्घायु प्रदान करने वाली और निःसंतान दंपतियों को संतान सुख का आशीर्वाद देने वाली देवी माना जाता है। छठी मैया की कथा का संबंध प्रकृति और मातृत्व की शक्ति से भी जोड़ा जाता है।
एक प्रचलित पौराणिक कथा राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी रानी मालिनी से जुड़ी है। कहा जाता है कि राजा प्रियव्रत के पास सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण वह और उनकी पत्नी बेहद दुखी रहते थे। संतान प्राप्ति की कामना से राजा ने महर्षि कश्यप के निर्देश पर यज्ञ कराया।
यज्ञ के बाद रानी मालिनी गर्भवती हुईं और उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश वह मृत पैदा हुआ। इस घटना से राजा और रानी पूरी तरह टूट गए। तभी वहां एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। उन्होंने अपना परिचय देवसेना के रूप में दिया और बताया कि वह प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसलिए उन्हें षष्ठी देवी कहा जाता है।
मान्यता है कि देवी की कृपा से राजा प्रियव्रत को संतान सुख प्राप्त हुआ। इसके बाद राजा ने षष्ठी देवी की पूजा की परंपरा शुरू की। लोकविश्वास में इसी कथा को छठी मैया की पूजा की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है।
महाभारत के कर्ण से क्या है छठ पूजा का संबंध?
छठी मैया की कथा और छठ पूजा का इतिहास जानने के साथ यह जानना भी दिलचस्प है कि इस पर्व का संबंध महाभारत के सूर्यपुत्र कर्ण से भी जोड़ा जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन सुबह नदी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते थे। सूर्य उपासना के साथ-साथ कर्ण अपनी उदारता और दानशीलता के लिए भी प्रसिद्ध थे। जरूरतमंदों को दान देना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।
कहा जाता है कि कर्ण की सूर्य आराधना ने उन्हें विशेष शक्ति और तेज प्रदान किया था। इसी वजह से लोकपरंपराओं में कर्ण को सूर्य उपासना की प्राचीन परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। छठ पूजा में भी सूर्य देव को जल अर्पित करने की परंपरा इसी आस्था की याद दिलाती है।
द्रौपदी ने भी की थी सूर्य देव की आराधना?
छठ पूजा से जुड़ी एक अन्य लोककथा महाभारत की द्रौपदी से संबंधित है। मान्यता है कि वनवास के दौरान जब पांडव अनेक कठिनाइयों का सामना कर रहे थे, तब द्रौपदी ने भगवान सूर्य की आराधना की थी।
पौराणिक प्रसंग के अनुसार सूर्य देव की कृपा से पांडवों को अक्षय पात्र प्राप्त हुआ था, जिससे उन्हें भोजन की समस्या से राहत मिली। हालांकि, द्रौपदी द्वारा वर्तमान स्वरूप में छठ का चार दिवसीय व्रत करने का कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह प्रसंग सूर्य उपासना से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के रूप में प्रचलित है।
माता सीता ने कहां किया था छठ व्रत?
छठ पूजा का संबंध रामायण और माता सीता से भी जोड़ा जाता है। लोकमान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने पर भगवान राम और माता सीता ने कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य देव की आराधना की थी। इसके अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा संपन्न की गई थी।
बिहार के मुंगेर में भी एक प्रचलित मान्यता है कि माता सीता ने यहां छठ व्रत किया था। मुंगेर के सीताचरण स्थल को इस लोकविश्वास से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, यह प्रसंग क्षेत्रीय धार्मिक आस्था और लोकपरंपरा का हिस्सा है।
छठ पूजा की शुरुआत कहां से हुई? क्या है इसका इतिहास?
छठ पूजा की शुरुआत कब और किसने की, इसका कोई एक प्रमाणित ऐतिहासिक उत्तर उपलब्ध नहीं है। हालांकि, छठी मैया की कथा और छठ पूजा का इतिहास मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्राचीन लोकपरंपराओं से जुड़ा माना जाता है।
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में सूर्य को जीवन, ऊर्जा और प्रकृति का आधार माना गया है। सूर्य की उपासना भारतीय धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। छठ पूजा इसी सूर्य आराधना की एक विशिष्ट लोकपरंपरा के रूप में विकसित हुई, जिसमें सूर्य देव के साथ षष्ठी देवी यानी छठी मैया की भी पूजा की जाती है।
समय के साथ बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे। वे अपने साथ छठ पूजा की परंपरा भी लेकर गए। आज दिल्ली, मुंबई, भोपाल, इंदौर, जबलपुर और देश के कई बड़े शहरों में छठ पर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। विदेशों में बसे भारतीय समुदायों के बीच भी इस पर्व की लोकप्रियता बढ़ी है।
यही वजह है कि छठ पूजा अब किसी एक क्षेत्र का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पारिवारिक एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक बन चुकी है।
छठ पूजा 2026 कब है? जानिए चारों दिनों की तारीखें
छठ पूजा का पर्व चार दिनों तक चलता है। इस दौरान व्रती कठिन नियमों का पालन करते हुए भगवान सूर्य और छठी मैया की आराधना करते हैं। छठ पूजा 2026 की प्रमुख तारीखें इस प्रकार हैं:
- 13 नवंबर 2026, शुक्रवार – नहाय-खाय: छठ महापर्व की शुरुआत होती है। व्रती स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं और पर्व के नियमों का पालन शुरू करते हैं।
- 14 नवंबर 2026, शनिवार – खरना: इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं। शाम को पूजा के बाद गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
- 15 नवंबर 2026, रविवार – संध्या अर्घ्य: छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। व्रती नदी, तालाब या जलाशय में खड़े होकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
- 16 नवंबर 2026, सोमवार – उषा अर्घ्य: पर्व के अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके साथ ही छठ व्रत का समापन होता है और व्रती पारण करते हैं।
आस्था, प्रकृति और परिवार को जोड़ता है छठ महापर्व
छठ पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, अनुशासन, स्वच्छता और पारिवारिक एकजुटता का भी संदेश देती है। इस पर्व में सूर्य देव को जीवन का आधार मानकर धन्यवाद दिया जाता है और छठी मैया से परिवार की सुख-समृद्धि तथा संतान की खुशहाली की कामना की जाती है।
छठी मैया की कथा और छठ पूजा का इतिहास भले ही अलग-अलग पौराणिक मान्यताओं और लोककथाओं से जुड़ा हो, लेकिन इस महापर्व की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामूहिक आस्था और कठिन साधना है। यही कारण है कि पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है।

