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UP Panchayat News: यूपी में इतिहास में पहली बार ग्राम प्रधान ही बनेंगे गांवों के ‘प्रशासक’, कार्यकाल खत्म होने के बाद भी नहीं छिनेंगे अधिकार

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UP Panchayat News: यूपी में इतिहास में पहली बार ग्राम प्रधान ही बनेंगे गांवों के ‘प्रशासक’, कार्यकाल खत्म होने के बाद भी नहीं छिनेंगे अधिकार।उत्तर प्रदेश में 25 मई को ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म हो गया है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने पंचायती राज विभाग के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है जिसके तहत अब एडीओ पंचायत के बजाय मौजूदा ग्राम प्रधान ही गांवों के ‘प्रशासक’ बने रहेंगे। पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

लखनऊ।उत्तर प्रदेश की त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में आज एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। राज्य में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल आज यानी 25 मई 2026 को समाप्त हो गया है, लेकिन इसके बावजूद गांवों में उनकी सत्ता और भूमिका बरकरार रहेगी। उत्तर प्रदेश पंचायती राज विभाग के एक विशेष प्रस्ताव को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हरी झंडी दे दी है, जिसके तहत अब मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही गांवों में ‘प्रशासक’ (Administrator) के रूप में काम सौंपा जाएगा। इस संबंध में सोमवार शाम तक आधिकारिक शासनादेश जारी होने की पूरी संभावना है।

 पहली बार बनी यह अनोखी व्यवस्था, टूट गई पुरानी परंपरा

उत्तर प्रदेश के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब ग्राम पंचायतों में इस तरह की प्रशासक समिति का गठन किया जा रहा है।

 क्यों टले चुनाव और अब कब होंगे?

दरअसल, राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव समय पर आयोजित नहीं कराए जा सके। ओबीसी (OBC) आरक्षण की स्थिति स्पष्ट न होने के कारण पूरी चुनाव प्रक्रिया अटक गई। अब जबकि ओबीसी आयोग का गठन हो चुका है, तब भी तकनीकी और प्रशासनिक तैयारियों में कम से कम 6 महीने का समय लगना तय माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि अब ये पंचायत चुनाव 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद ही संपन्न हो पाएंगे।

 चुनाव से पहले कोई ‘जोखिम’ नहीं लेना चाहती सरकार

इस फैसले के पीछे एक बड़ा राजनीतिक कारण भी माना जा रहा है। राज्य में अगले साल ही विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। हाल ही में ग्राम प्रधानों ने सरकारी सचिवों को प्रशासक बनाए जाने के प्रस्ताव के खिलाफ लखनऊ में बड़ा विरोध प्रदर्शन किया था। ऐसे में सरकार ग्रामीण स्तर पर जमीनी पकड़ रखने वाले प्रधानों को नाराज करके कोई बड़ा राजनीतिक जोखिम नहीं लेना चाहती थी। यही वजह है कि बीच का रास्ता निकालते हुए प्रधानों को ही प्रशासक की कुर्सी सौंप दी गई है।

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