मरीजों को ठीक करने वाले खुद बीमार, NMC के सर्वे ने पोल खोली है। नेशनल मेडिकल कमीशन के इस सर्वे में ये दावा किया गया है कि मेडिकल के लगभग 28 परसेंट ग्रेजुएट और 15.3 परसेंट पोस्ट ग्रेजुएट छात्रों ने मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझने की बात स्वीकार की है. कोलकाता की घटना के बाद डॉक्टरों की मनोस्थिति के बारे में जानने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने एक ऑनलाइन सर्वे कराया है. इस सर्वे में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं.
कोलकाता रेप मर्डर केस के बाद डॉक्टर अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. देश भर में प्रदर्शन चल रहे हैं. कोलकाता की पीड़िता को न्याय की मांग के साथ डॉक्टर इस जिद पर भी अड़ें हैं कि उन्हें सुरक्षा की गारंटी मिले. हालांकि सुरक्षा के साथ ऐसी कई समस्याएं हैं, जिनसे डॉक्टर जूझ रहे हैं. राष्ट्रीय स्वास्थ्य कमीशन की एक रिपोर्ट खुद इस बात की गवाही दे रही है. इस रिपोर्ट की मानें तो जिन पर इलाज की जिम्मेदारी है या भविष्य में मिलने वाली है, वह खुद मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं.
नेशनल मेडिकल कमीशन के इस सर्वे में ये दावा किया गया है कि मेडिकल के लगभग 28 परसेंट ग्रेजुएट और 15.3 परसेंट पोस्ट ग्रेजुएट छात्रों ने मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझने की बात स्वीकार की है. सर्वे में 38 हजार छात्रों ने हिस्सा लिया है. इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले 12 महीनों में 16.2 परसेंट एमबीबीएस छात्रों ने मन में खुद को नुकसान पहुंचाने और आत्महत्या करने का विचार आने की बात भी कही है.
सात से आठ घंटे की नींद जरूरी
जून में इस सर्वे को रिपोर्ट को जून में अंतिम रूप दिया गया. इस रिपोर्ट के आधार पर सभी डाक्टरों को एक सलाह दी गई है. कहा गया है कि डाक्टरों को सप्ताह में एक दिन की छुट्टी जरूर लेनी चाहिए. इसके साथ ही रोजाना सात से आठ घंटे की नींद लें. रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि छात्रों में अकेलेपन या सामाजिक अलगाव की भावना आम है. करीब 35 परसेंट छात्र हमेशा इसका अनुभव करते हैं. इस पर रिपोर्ट से पता चलता है कि सामाजिक संबंध बनाए रखने में उन्हें मुश्किल होती है, इसलिए ये उन्हें कुछ हद तक कठिन लगता है.
पढ़ाई के भार पर क्या बोले छात्र
सर्वे में पता चला कि छात्रों में तनाव भी एक बड़ी समस्या है. सर्वे में शामिल लोगों में से 36.4 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें तनाव से निपटने के लिए ज्ञान और कौशल की कमी महसूस होती है. इसमें ही 18.2 प्रतिशत लोगों ने फैकल्टी से बहुत कम सहयोग मिलने की बात कही है. इस सर्वे के अनुसार, 56.6 प्रतिशत छात्रों ने अपने पढ़ाई के भार को संभालने योग्य बताया, लेकिन 20.7 प्रतिशत छात्रों का कहना है कि उन पर पढ़ाई को लोड बहुत ज्यादा है. वहीं केवल 1.5 प्रतिशत ने इस भार को हल्का बताया है.
फेल होने का डर भी है बड़ा कारण
सर्वे में पाया गया कि छात्रों को सबसे ज्यादा फेल होने का डर है. इसमें 51.6 प्रतिशत छात्रों का मानना है कि रिजल्ट उनपर निगेटिव असर डालता है. इसके अलावा 10,383 छात्र यानी 40.6 प्रतिशत लगातार टॉप ग्रेड पाने का दबाव महसूस करते हैं. इतना ही नहीं बल्कि सर्वे के मुताबिक 56.3 प्रतिशत यूजी के छात्र व्यक्तिगत जीवन और पढ़ाई के बीच संतुलन बैठाने में समस्या महसूस करते हैं. मेडिकल के सिलेबस से बढ़ रहा तनाव भी एक बड़ा कारण है.
सर्वे में पाया गया कि बार-बार परीक्षा लिए जाने को 35.9 प्रतिशत छात्रों ने तनावपूर्ण बताया और 37.6 प्रतिशत के लिए यह मध्यम रूप से तनावपूर्ण है. मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को 18.6 प्रतिशत छात्रों ने बहुत या कुछ हद तक दुर्गम माना है. 18.8 प्रतिशत ने इन सेवाओं की गुणवत्ता को बहुत खराब बताया है.
रैगिंग को लेकर भी हुआ खुलासा
मेडिकल के 25,590 ग्रेजुएट छात्रों के लिए रैगिंग और तनाव से संबंधित मापदंडों का विश्लेषण उनके अनुभवों और तनाव के स्तर के बारे में महत्वपूर्ण कई जानकारी सामने आई हैं. सर्वे के मुताबिक करीब 76.8 परसेंट छात्रों ने बताया कि उन्होंने किसी भी तरह की रैगिंग या उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है. वहीं 9.7 प्रतिशत ने ऐसे अनुभवों की के बारे में बताया. 70.1 प्रतिशत छात्रों का मानना है कि उनके कॉलेज में रैगिंग को रोकने और उससे निपटने के लिए पर्याप्त उपाय हैं. वहीं 3,618 (14.1 प्रतिशत) इस बात से राजी नही हैं. हॉस्टल को लेकर भी करीब 50 परसेंट छात्रों अपना अनुभव ठीक नही बाताया है.
