Supreme Court Landmark Judgment: बिहार वोटर लिस्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला; चुनाव आयोग के पास SIR कराने का पूरा अधिकार, याचिकाएं खारिज
नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने बुधवार को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की दिशा में एक बेहद बड़ा और नज़ीर बनने वाला फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि चुनाव आयोग (Election Commission) के पास वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कराने का पूरा संवैधानिक और कानूनी अधिकार है।
अदालत ने बिहार में वोटर लिस्ट की इस विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया है। इन याचिकाओं में दावा किया गया था कि संविधान के अनुच्छेद 326 और ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ के तहत आयोग के पास इतने बड़े पैमाने पर SIR कराने की शक्ति नहीं है, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह से अमान्य ठहरा दिया।
“वोटर लिस्ट की शुद्धता ही लोकतंत्र की नींव” – सुप्रीम कोर्ट
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग के कदम को सही ठहराया।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा: “हम इस बात से पूरी तरह संतुष्ट हैं कि एसआईआर (SIR) का उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक लक्ष्य से सीधा जुड़ा हुआ है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान के दिन की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते। वे मूल रूप से वोटर लिस्ट की सत्यनिष्ठा, सटीकता और विश्वसनीयता पर निर्भर करते हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव हैं।”
अदालत ने आगे जोड़ा कि बिहार में अंतिम गहन संशोधन के बाद से चार दशक (40 वर्ष) से अधिक का समय बीत चुका था। इस दौरान तीव्र शहरीकरण, प्रवासन (Migration) और बड़े पैमाने पर नामों के जुड़ने-हटने से वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों की आशंका थी, जिसे सुधारना आयोग का मूलभूत कर्तव्य है।
Supreme Court Landmark Judgment: बिहार वोटर लिस्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला; चुनाव आयोग के पास SIR कराने का पूरा अधिकार, याचिकाएं खारिज
65 लाख नामों को हटाने का हुआ था बचाव, ‘आधार’ पर कही थी यह बात
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग ने एसआईआर (SIR) के बाद उन 65 लाख लोगों के नामों की सूची जारी की थी, जिन्हें बाद में प्रकाशित ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था।
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पुश्तैनी संबंध का नियम: आयोग की अधिसूचना के मुताबिक, जो वोटर्स 2002 या 2003 की वोटर लिस्ट में शामिल नहीं थे, उन्हें उस समय की लिस्ट में मौजूद किसी व्यक्ति के साथ अपना ‘पुश्तैनी संबंध’ साबित करना था।
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नागरिकता का सबूत: इस प्रक्रिया का बचाव करते हुए चुनाव आयोग ने कोर्ट में यह बेहद महत्वपूर्ण तर्क दिया था कि आधार कार्ड (Aadhaar Card) और वोटर आईडी कार्ड को नागरिकता का ‘पुख्ता सबूत’ नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ताओं ने लगाया था ‘NRC जैसी प्रक्रिया’ का आरोप
मशहूर एनजीओ ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) और उनके वकील प्रशांत भूषण ने इस प्रक्रिया पर कड़े सवाल उठाए थे। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि:
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वोटर लिस्ट का यह संशोधन एक “NRC जैसी प्रक्रिया” है, जिसके जरिए चुनाव आयोग नागरिकता की जांच कर रहा है, जबकि यह विशेष अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
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इतनी बड़ी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए तय की गई समयसीमा बेहद कम थी।
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उन 65 लाख वोटर्स के आंकड़ों पर भी सवाल उठाए गए जिन्हें मृत, प्रवासी या अन्य क्षेत्रों में रजिस्टर्ड बताकर सूची से बाहर किया गया।
फैसले का निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 12 अगस्त को इस मामले पर अंतिम बहस शुरू की थी और 29 जनवरी को लंबी सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। आज कोर्ट ने साफ कर दिया कि नामों को जोड़ना या हटाना पूरी तरह से चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार क्षेत्र है और इसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।

