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जम्मू कश्मीर में बदली राजनीति: अलगाववाद से दूरी

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जम्मू कश्मीर में बदली राजनीति: अलगाववाद से दूरी।जम्मू-कश्मीर में दस वर्षों के बाद और अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद हुए पहले विधानसभा चुनावों में एक अच्छी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की उम्मीद रखते हुए कश्मीर घाटी में कई ऐसे चेहरे मैदान में उतरे थे, जो पहले कभी अलगाववाद से जुड़े हुए थे या अलगाववादी विचारधारा रखते थे।

खासकर प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) जैसे संगठन की बात करें, तो उसने चुनाव बहिष्कार की अपनी रणनीति को दरकिनार कर मुख्यधारा में कदम रखने का फैसला किया था। उसके अनुसार, लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही एकमात्र ऐसा हल है, जिससे जनता के मसलों को हल किया जा सकता है। हिंसा और बहिष्कार  किसी मुद्दे का समाधान नहीं कर सकते।

कश्मीर घाटी में जेईआई के या जेईआई समर्थित जो उम्मीदवार मैदान में अपनी किस्मत आजमाने उतरे थे उनमें से कुछ प्रमुख सैयार रेशी (कुलगाम), एजाज अहमद मीर (जैनापोरा), डॉ तलत मजीद (पुलवामा), अब्दुल रेहमान शाला (बारामुला), मजूूर कलू (सोपोर) और कलीमुल्ला लोन (लंगेट) शामिल थे। इसके अलावा सरजन बरकाती (गांदरबल और बीरवाह) और अफजल गुरु के भाई एजाज गुरु (सोपोर) भी मैदान में उतरे थे जो कट्टर अलगाववादी विचारधारा से संबंध रखते थे। लेकिन कश्मीर की अवाम ने इन सबकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

जमात और एआईपी को झटका
घाटी के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शौकत साहिल ने बताया कि नतीजे कहीं न कहीं यह दर्शाते हैं कि लोगों को इन उम्मीदवारों पर शक था कि वे जो कुछ कर रहे हैं, दिल्ली के इशारों पर कर रहे हैं। इसलिए लोगों ने उनपर भरोसा नहीं जताया। उन्होंने कहा, मतदाता तीन हिस्सों में बंटे थे। एक वर्ग वो जो सिस्टम से नाराज था और मान रहा था कि वोट दें या नहीं, कुछ बदलने वाला नहीं है।

दूसरा एक तबका ऐसा था जिसे उम्मीद थी कि अबकी बार हमारी अपनी सरकार होगी तो हम रोजमर्रा का मसलों को हल कर सकेंगे। तीसरा ऐसा तबका था जो केंद्र सरकार के 5 अगस्त, 2019 को लिए गए फैसले से नाराज था। उसके बाद घाटी के लोगों को लगा कि केंद्र ने एआईपी के इंजीनियर रशीद को परदे के पीछे से समर्थन दिया है या फिर एआईपी ने जमात को। इसलिए उसने इनकी रणनीति को नकार दिया। बता दें जहां जमात को किसी भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई है वहीं एआईपी की आेर से मैदान में उतारे गए 38 उम्मीदवारों में से 37 हार गए और केवल लंगेट सीट पर उसे कामयाबी हासिल हुई है।

जमात का नहीं खुला खाता, एआईपी को एक सीट

 

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