ताड़ के पेड़ होंगे बिजली : बरसात के मौसम मे बिजली गिरने की घटना से जनहानि होती रहती है. ऐसे मे ओडिशा सरकार ने बिजली गिरने की घटनाओं को कम करने के लिए ताड़ के पेड़ लगाने की योजना बनाई है. पिछले 11 वर्षों में बिजली गिरने से ओडिशा में लगभग 4,000 लोगों की मौत हो चुकी है. इस समस्या से निपटने के लिए जुलाई में ओडिशा सरकार ने 19 लाख ताड़ के पेड़ लगाने की स्वीकृति दी. आइए जानते है क्यो है ताड़ के पेड़ लगाने कि योजना और इससे बिजली गिरने की घटनाओ से होने वाली मौतो को कैसे कम किया जा सकता है.
विपत्ति के शिकार मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्र के लोग होते हैं, जहां 96% बिजली की घटनाएँ होती हैं. किसान और दैनिक श्रमिक, जो कृषि कार्य में लगे होते हैं और लंबे समय तक खुली जगह पर काम करते हैं इन घटनाओं से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं. बिजली गिरना 2015 में ओडिशा के लिए एक विशेष आपदा घोषित किया गया था. 2 सितंबर 2023 को ओडिशा ने दो घंटे की अवधि में 61,000 बिजली गिरने की घटनाओं का रिकॉर्ड दर्ज किया जिसमें कम से कम 12 लोगों की मौत हुई.
ताड़ के पेड़ को बिजली गिरने से सुरक्षा के प्राकृतिक साधन के रूप में देखा जा रहा है, जो संभावित रूप से बिजली गिरने से होने वाली मौतों को कम कर सकते हैं. ताड़ के पेड़ उच्च और मजबूत होते हैं, और उनकी संरचना बिजली को अवशोषित करने में मदद कर सकती है, जिससे बिजली गिरने की घटनाओं को नियंत्रित किया जा सकता है.
हालांकि इस दृष्टिकोण की वैज्ञानिक वैधता पर विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं. उनका तर्क है कि ताड़ के पेड़ों को प्रभावी रूप से बिजली को अवशोषित करने में लगभग 20 वर्षों का समय लगता है, जिससे तत्काल सुरक्षा प्रदान करने में ये पेड़ अप्रभावी हो सकते हैं. बांग्लादेश में किए गए समान प्रयासों से यह निष्कर्ष निकला है कि बिजली गिरने से होने वाली मौतों में कोई विशेष कमी नहीं आई है. ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या ताड़ के पेड़ों का यह उपाय वास्तव में प्रभावी होगा या नहीं. कुछ विशेषज्ञ यह मानते हैं कि ऊंचे पेड़, जैसे कि ओक, मेपल, पॉपलर, ऐश, पाइन और ट्यूलिप, बिजली गिरने को अवशोषित कर सकते हैं. वे सुझाव देते हैं कि सभी ऊंचे पेड़ों की सुरक्षा की जानी चाहिए, न कि केवल ताड़ के पेड़ों की, ताकि बिजली गिरने से होने वाली मौतों को कम किया जा सके. इस दृष्टिकोण से, पेड़ की प्रजातियों की विविधता और उनकी ऊँचाई की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने से सुधार हो सकता है.
क्यो गिरती है बिजली?
बिजली (लाइटेनिंग) बादलों, हवा या जमीन के बीच वायुमंडल में बिजली की एक विशाल चिंगारी है. शुरुआती चरणों में हवा बादल में पॉजिटिव और नेगेटिव चार्ज के बीच और बादल और जमीन के बीच एक इन्सुलेटर के रूप में कार्य करती है. जब विपरीत आवेश पर्याप्त मात्रा में बनते हैं तो हवा की यह इन्सुलेटिंग क्षमता टूट जाती है और एलेक्ट्रिसिटी का तेजी से फ्लो होता है जिसे हम लाइटेनिंग के रूप में जानते हैं। बिजली की चमक अस्थायी रूप से वायुमंडल में आवेशित क्षेत्रों को तब तक बराबर करती है जब तक कि विपरीत आवेश फिर से नहीं बन जाते. लाइटेनिंग गरजने वाले बादल के भीतर विपरीत आवेशों के बीच (अंतर-बादल बिजली) या बादल और जमीन पर विपरीत आवेशों के बीच (बादल से जमीन पर बिजली) हो सकती है।
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क्या ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बढ़ती है बिजली गिरने की घटनाये?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिजली हाइ स्पीड और विशाल मात्रा में करंट का डिस्चार्ज है जो पृथ्वी की ओर डाइरेक्टेड होता है. ओडिशा एक पूर्वी तटीय राज्य है जिसका उष्णकटिबंधीय जलवायु बिजली गिरने के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ प्रदान करती है. वार्षिक बिजली रिपोर्ट 2023-2024 के अनुसार, पूर्वी और मध्य भारत में सबसे अधिक बादलों से बिजली गिरती है. आईएमडी द्वारा 2021 में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार हर एक डिग्री सेल्सियस के दीर्घकालिक गर्मी से बिजली की गतिविधियों में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है.
