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ओवैसी, कांग्रेस और AAP का सूपड़ा साफ…मुस्लिम बहुल मुस्तफाबाद में बीजेपी ने कैसे रचा इतिहास?

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ओवैसी, कांग्रेस और AAP का सूपड़ा साफ…मुस्लिम बहुल मुस्तफाबाद में बीजेपी ने कैसे रचा इतिहास?।दिल्ली के चुनाव परिणाम में अगर सबसे ज्यादा किसी विधानसभा सीट की चर्चा है तो वो है मुस्तफाबाद. मुस्लिम बहुल मुस्तफाबाद सीट से बीजेपी के मोहन सिंह बिष्ट 30 हजार वोटों से आगे है. वो भी तब, जब चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने यहां मोहन सिंह बिष्ट की तैनाती की थी. बिष्ट पहले करावल नगर सीट से विधायक थे। आम आदमी पार्टी ने मुस्तफाबाद से आदिल अहमद, एआईएमआईएम ने ताहिर हुसैन और कांग्रेस से अली मेहदी मैदान में थे।

मुस्तफाबाद विधानसभा सीट का समीकरण

मुस्तफाबाद सीट पर मुसलमानों की आबादी करीब 40 प्रतिशत है. इसके बाद यहां ठाकुर और दलित मतदाता हैं. ठाकुर यहां पर करीब 12 प्रतिशत है. इसके अलावा दलित 10 प्रतिशत के आसपास है. कुल मिलाकर देखा जाए तो मुस्तफाबाद सीट पर 40 फीसद मुसलमान और 60 प्रतिशत हिंदू हैं.

. ताहिर हुसैन और ओवैसी की एंट्री- मुस्तफाबादा सीट से आम आदमी पार्टी ने आदिल अहमद को उम्मीदवार बनाया था. आदिल पूर्व विधायक हसन अहमद के बेटे हैं. आखिरी वक्त में असदुद्दीन ओवैसी ने यहां से ताहिर हुसैन को उतार दिया. ताहिर दिल्ली दंगे के आरोपी हैं. पर्चा दाखिल करने के बाद ताहिर प्रचार करने की इजाजत लेने सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. सुप्रीम कोर्ट से इजाजत मिली तो वे मैदान में उतर गए. ताहिर के मैदान में उतरने से पूरा चुनाव हिंदू वर्सेज मुस्लिम हो गया.

3. 5 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतरे- मुस्तफाबाद सीट से 5 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतरे गए, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर आप को उठाना पड़ा. कांग्रेस के अली मेहदी भले चौथे नंबर पर रहे, लेकिन वे भी मुसलमानों के वोट काटने में ही सफल रहे. दूसरी तरफ एक को छोड़कर किसी भी हिंदू उम्मीदवार को 1000 से ज्यादा वोट नहीं मिले हैं.

4. डोर टू डोर कैंपेन पर फोकस- बीजेपी ने यहां डोर टू डोर कैंपेन पर फोकस किया. पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर यहां मोर्चा संभाल रहे थे. मोहन सिंह बिष्ट की जमीनी पकड़ और अनुराग की मोर्चेबंदी की वजह से बीजेपी मुस्लिम बहुल मुस्तफाबाद सीट पर बड़ी जीत दर्ज करने में सफल रही.

5. टिकट बदलना पड़ा भारी- 2020 में यहां पर हाजी युनूस ने बीजेपी के जगदीश प्रधान को हरा दिया था. इस बार आम आदमी पार्टी ने युनूस का टिकट बदलकर आदिल को मैदान में उतार दिया. आदिल हिंदू वोटरों में सेंधमारी नहीं कर पाए. यही वजह है कि इस सीट पर आप को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा.

आदिल को अगर इस सीट पर मुस्लिम के साथ हिंदुओं के वोट मिलते तो नतीजा बदल सकता था. आदिल ताहिर के पक्ष में ध्रुवीकरण को भी खत्म नहीं कर पाए.

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