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MP का पहला केस, जिसमें पिता को ढाई साल की बच्ची की कस्डटी मिली

gunpreet bhatiya

इंदौर। बच्चे पर पहला हक मां का होता है। जब माता-पिता के अलग होने की स्थिति में किसी एक को बच्चे को सौंपने की बारी आती है तब भी यह अधिकार पिता को नहीं मिल पाता है, लेकिन प्रेमनगर में रहने वाले 30 वर्षीय गुनप्रीत भाटिया के पक्ष में कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि ढाई साल की बेटी को मां की जगह पिता को ही सौंपा जाए। कोर्ट ने उसके भविष्य को देखते हुए यह फैसला लिया। यह प्रदेश का पहला मामला है। स्कूल के दस्तावेज में भी मां के नाम पर उन्हीं का नाम दर्ज है।

गुनप्रीत भाटिया एक निजी बैंक में मैनेजर हैं। उनकी 4 वर्षीय बेटी गुरमनी कौर है। गुनप्रीत की सेंधवा में रहने वाली बलप्रीत कौर से 19 फरवरी 2013 को शादी हुई थी। दोनों का रिश्ता ज्यादा दिन नहीं चल पाया और उनमें विवाद होने लगा। 16 फरवरी 2016 को ढाई साल की गुरमनी को लेकर बलप्रीत घर से गायब हो गई। तीन दिन तक परिजन उसे तलाशते रहे। जूनी इंदौर थाने में गुमशुदगी भी दर्ज हुई। इस बीच पता चला कि बलप्रीत मनमाड़ में देखी गई।

वहां उसकी तलाश में गए तो उसके सेंधवा जाने की खबर मिली। सेंधवा में चाचा के घर बलप्रीत रह रही थी। गुनप्रीत ने उससे घर चलने के लिए कहा तो उसने इनकार कर दिया। उसने बेटी को सौंपते हुए कहा कि तुम्हारा खून है, इसे ले जाओ। एक महीने बाद सेंधवा स्थित एसडीएम कोर्ट के माध्यम से बलप्रीत बच्ची का कस्टडी ऑर्डर लेकर घर आई। वह गुरमनी को लेकर चली गई। फिर वह तलाक और बच्ची की कस्टडी देने के लिए 20 लाख रुपए मांगने लगी।

कोर्ट का फैसला ही मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी

गुनप्रीत ने कोर्ट में बच्ची की कस्टडी व तलाक के लिए आवेदन किया। दस महीने तक केस चला। गुनप्रीत ने बताया कि 21 दिसंबर 2016 को बेटी की कस्टडी मुझे मिली। कोर्ट ने कहा कि बलप्रीत का परिवार अवैध शराब का धंधा करता है, जो बच्ची के भविष्य के लिए ठीक नहीं है। बेटी की कस्टडी पिता को सौंपी जाए। यह फैसला मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी है। हाई कोर्ट ने भी मेरे पक्ष में आदेश दिए। बलप्रीत के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया गया। 8 वारंट जारी हुए थे, लेकिन वह एक बार भी कोर्ट नहीं आई। कोर्ट ने उसे फरार घोषित कर दिया। आखिर काफी जद्दोजहद के बाद उसे तलाक भी मिल गया।

मुझे पिता बनकर ही जीना है

गुनप्रीत के परिवार में बुजुर्ग पिता जसपालसिंह भाटिया व मां कमलजीत कौर हैं। वे चाहते हैं कि गुनप्रीत दूसरी शादी कर ले। उसके सामने लंबी जिंदगी है, लेकिन गुनप्रीत ने दूसरी शादी नहीं करने की ठानी है। वे कहते हैं मेरा लक्ष्य है सिर्फ बेटी की अच्छी परवरिश करना। उन्होंने कहा कि मुझे किसी का पति नहीं बनना। एक पिता की तरह जिंदगी जीना है। इससे बढ़कर मेरे लिए कोई खुशी नहीं। वे सुबह बेटी को तैयार कर स्कूल छोड़ते हैं। उसके बाद ऑफिस जाते हैं। स्कूल के बाद उसे अपने हाथों से खाना खिलाकर सुलाते हैं। गुनप्रीत का कहना है कि ऑफिस का स्टाफ भी मुझे सपोर्ट करता है। उन्हें पता है कि मेरी बेटी छोटी है। उसके लिए मेरे अधिकारी भी मुझे रियायत दे देते हैं। वर्किंग टाइम के बाद मैं पूरा समय अपनी बेटी के साथ बिताता हूं।

मैं पापा की बेटी हूं और वो मेरे सबसे अच्छे पापा हैं

गुरमनी रोज पिता गुनप्रीत के साथ गुरुद्वारा जाती है। वह केजी-1 में पढ़ती है। उसने कहा कि मैं पापा की बेटी हूं। मेरे पापा सबसे अच्छे पापा हैं।

यह प्रदेश का पहला केस है जिसमें पिता को ढाई साल की बच्ची की कस्डटी मिली। गुनप्रीत के इस केस का निर्णय उन पिता के लिए प्रेरणा है जो समझते हैं कि सात साल से कम उम्र के बच्चों की कस्टडी सिर्फ मां को ही मिलती है। गुनप्रीत की पत्नी बलप्रीत कौर बेटी के लिए एसडीएम कोर्ट पहुंची थी, जहां सेमां के पक्ष में एकतरफा कस्टडी का ऑर्डर दिया गया था।

इसको लेकर हमने सेशन कोर्ट में रिविजन लगाई। कोर्ट ने तीन बिंदुओं पर सहमति जताते हुए गुनप्रीत के पक्ष में फैसला सुनाया। पहला, माता-पिता को कस्टडी के मामले में समान अधिकार है। दूसरा, बच्ची की मां के परिवार का अवैध शराब का कारोबार था। इससे बच्ची को बेहतर माहौल नहीं मिल पाता। तीसरा, बलप्रीत ने पुलिस थाने में भरण-पोषण का केस लगाया था। उसमें जिक्र किया गया था कि वह आर्थिक रूप से कमजोर है। जब वह आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है तो बेटी की परवरिश नहीं कर पाएगी। इससे बेटी का भविष्य खतरे में है। इस पर सेशन कोर्ट ने पिता के पक्ष में फैसला दिया।

– अजीत जैन, अधिवक्ता

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