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‘दवा खाना हुआ महंगा’: केंद्र सरकार ने लोकसभा में माना- 3 साल में 6.94% बढ़ीं नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं; हर दिन औसतन 9 सैंपल फेल

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‘दवा खाना हुआ महंगा’: केंद्र सरकार ने लोकसभा में माना- 3 साल में 6.94% बढ़ीं नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं; हर दिन औसतन 9 सैंपल फेल

नई दिल्ली: अस्पताल से लौटने के बाद अगर आपको लगता है कि डॉक्टर की फीस से ज्यादा दवाइयों के बिल ने आपकी जेब हल्की की है, तो आप अकेले नहीं हैं. केंद्र सरकार ने खुद संसद में यह स्वीकार किया है कि पिछले तीन वर्षों में देश में नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं (Non-Scheduled Drugs) की कीमतों में औसतन 6.94 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ोतरी हुई है [cite: लोकसभा में पेश एक जवाब में केंद्र सरकार ने स्वीकार किया है कि पिछले तीन वर्षों में नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों में औसतन 6.94 प्रतिशत सालाना की बढ़ोतरी हुई है.].

भले ही यह आंकड़ा सरकार द्वारा तय 10% की अधिकतम वार्षिक सीमा के भीतर हो, लेकिन आम जनता की जेब पर इसका निरंतर भारी असर पड़ रहा है. इसके साथ ही, देश में नकली और घटिया क्वालिटी की दवाओं का नेटवर्क भी एक बड़ी चिंता बनकर उभरा है.

 शेड्यूल्ड और नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं में क्या अंतर है?

सरकार दवाओं की कीमतें दो प्रमुख श्रेणियों में नियंत्रित करती है [cite: रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने बताया कि देश में दवाओं की कीमतें ड्रग्स ऑर्डर, 2013 (DPCO, 2013) के प्रावधानों के तहत नियंत्रित होती हैं.]:

  1. शेड्यूल्ड दवाएं (Scheduled Drugs): ये वे जीवनरक्षक दवाएं हैं जो नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) में शामिल हैं [cite: शेड्यूल्ड दवाएं वे होती हैं जो नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) में शामिल हैं और DPCO, 2013 की शेड्यूल-I सूची में आती हैं.]. इनकी अधिकतम सीमा (Ceiling Price) NPPA सीधे तय करती है [cite: इन जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत सीधे NPPA तय करती है और कोई भी कंपनी उससे ज्यादा दाम पर इन्हें नहीं बेच सकती.].

    • मूल्य वृद्धि दर: 2024 में 0.00551%, 2025 में 1.74028% और 2026 में 0.64956% (WPI के आधार पर) रही है [cite: शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतें डब्ल्यूपीआई के आधार पर बढ़ीं. 2024 में 0.00551%, 2025 में 1.74028% और 2026 में 0.64956%.].

  2. नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं (Non-Scheduled Drugs): ये दवाएं NLEM की अनिवार्य सूची में नहीं होती हैं और फार्मा कंपनियां खुद इनकी MRP तय करती हैं [cite: वहीं, नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं वे हैं जो NLEM की इस सूची से बाहर हैं, जिनकी कीमत सरकार सीधे तय नहीं करती, बल्कि निर्माता खुद अपनी कीमत तय करते हैं.]. कंपनियों को 12 महीनों में अधिकतम 10% तक ही MRP बढ़ाने की अनुमति होती है, जिससे इनमें सालाना औसत 6.94% की वृद्धि दर्ज की गई.

 ‘नकली और घटिया दवाओं का संकट’: रोज़ाना औसतन 9 सैंपल फेल

वर्ष 2025-26 के सरकारी जांच आंकड़े बताते हैं कि गुणवत्ता के मोर्चे पर हालात काफी चिंताजनक हैं:

 आखिर क्यों महंगी हो रही हैं दवाएं? (मुख्य वजहें)

  1. कच्चे माल (API) का संकट: मिडल ईस्ट संकट और समुद्री माल ढुलाई (Container Crisis) में दिक्कतों के कारण चीन से आने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट (API) की सप्लाई प्रभावित हुई, जिससे कई रसायनों की लागत 200% से 300% तक बढ़ गई [cite: मिडिल ईस्ट संकट के चलते कंटेनर जहाजों की कमी हुई, जिससे चीन से आने वाले कच्चे माल (API) की सप्लाई प्रभावित हुई और कई रसायनों की कीमतें 200-300 प्रतिशत तक बढ़ गईं.].

  2. विदेशी मुद्रा व अंतरराष्ट्रीय किल्लत: कैंसर की प्लैटिनम-आधारित दवाओं और बच्चों के टीकों की कीमतें कच्चे माल की किल्लत और करेंसी एक्सचेंज रेट में उतार-चढ़ाव के कारण 50% तक बढ़ गईं [cite: कैंसर की प्लैटिनम-आधारित दवाओं और बच्चों के टीकों की कीमतें भी कच्चे माल की किल्लत व मुद्रा विनिमय दर में उतार-चढ़ाव के कारण 50 प्रतिशत तक बढ़ीं.].

भारतीय दवा बाजार और मूल्य नियंत्रण 2026: एक नजर में

विषय/बिंदु सरकारी आंकड़े व फैक्ट्स
NPPA द्वारा नियंत्रित सीलिंग प्राइस 935 फॉर्मूलेशन (23 जुलाई 2026 तक)
NLEM 2022 से राहत री-फिक्सिंग से औसतन ~17% की कमी
जनऔषधि केंद्र पर छूट 50% से 80% तक सस्ती दवाएं [cite: जनऔषधि केंद्रों पर दवाएं 50-80% तक सस्ती मिलती हैं, जिससे मरीजों के इलाज का खर्च कम करने की कोशिश की जा रही है.]
अमृत फार्मेसी (AMRIT) कैंसर व कार्डियक दवाओं पर औसतन 50% तक छूट
3 साल में नकली/घटिया मामले 9,104 घटिया और 810 नकली/मिलावटी मामले सामने आए
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