Katni: कटनी में सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को तगड़ा झटका, एसडीएम कोर्ट ने 3.41 एकड़ का खिरहनी तालाब फिर किया शासकीय; 1966 के बाद हुआ था बड़ा ‘खेल’
Katni: कटनी में सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को तगड़ा झटका, एसडीएम कोर्ट ने 3.41 एकड़ का खिरहनी तालाब फिर किया शासकीय; 1966 के बाद हुआ था बड़ा 'खेल'
Katni: कटनी में सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को तगड़ा झटका, एसडीएम कोर्ट ने 3.41 एकड़ का खिरहनी तालाब फिर किया शासकीय; 1966 के बाद हुआ था बड़ा ‘खेल’
कटनी: कटनी के ग्राम खिरहनी में करोड़ों रुपये की बेशकीमती जमीनी जादूगरी और तालाब पर कब्जे के खेल का आखिरकार पर्दाफाश हो गया है। ग्राम खिरहनी स्थित खसरा नंबर 1091 एवं 1092 (कुल रकबा 3.41 एकड़) पर फैले ऐतिहासिक तालाब के मालिकाना हक को लेकर चल रहे लंबे विवाद पर एसडीएम न्यायालय (SDM Court) ने एक बड़ा और कड़ा फैसला सुनाया है।
कलेक्टर श्री आशीष तिवारी द्वारा मामले को गंभीरता से लिए जाने के बाद, कोर्ट ने राजस्व रिकॉर्ड को दुरुस्त करने का हुक्म दिया है। अब यह पूरी भूमि निजी भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त होकर पुनः ‘शासकीय’ (सरकारी) दर्ज कर ली गई है।
क्या था मामला? बिना किसी सरकारी आदेश के रातों-रात बदल गए थे ‘कागज’
इस पूरे जमीनी खेल की कहानी तब शुरू हुई जब ग्राम खिरहनी के निवासी राजकुमार, वृन्दावन पटेल और अन्य ग्रामीणों ने सार्वजनिक हित के लिए एसडीएम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ग्रामीणों का आरोप था कि यह तालाब सदियों से गांव के निस्तार और सार्वजनिक उपयोग के लिए था, लेकिन कुछ रसूखदारों ने फर्जी तरीके से अपना नाम सरकारी कागजों में चढ़वा लिया था।
जब तहसीलदार (कटनी नगर) और जिला अभिलेखागार (Record Room) की टीम ने इसकी गहराई से जांच की, तो एक चौंकाने वाला ‘शासकीय जादू’ सामने आया:
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1962-63 का रिकॉर्ड: खसरे के कॉलम-3 पर यह भूमि साफ तौर पर ‘सरकार’ दर्ज थी।
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1963-64 से 1965-66 तक: यह जमीन ‘प्रांतीय सरकार’ के नाम पर दर्ज रही।
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1966-67 में हुआ खेल: इस साल बिना किसी सक्षम अधिकारी या कलेक्टर के वैध आदेश के, इस सरकारी तालाब को अचानक निजी व्यक्तियों (नरबदा प्रसाद आदि) के नाम पर ‘भूमिस्वामी’ के रूप में दर्ज कर दिया गया।
अनावेदकों की दलीलें कोर्ट में हुईं ‘फ्यूज’
मामले की सुनवाई के दौरान कब्जाधारी पक्ष (अनावेदकों) के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी कि यह जमीन साल 1907-08 से ही उनके पूर्वजों के नाम पर थी और बीच में शासन का नाम गलती से चढ़ गया था। उन्होंने अपने पक्ष में पुराने सिविल कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया।
लेकिन जब एसडीएम कोर्ट ने उनसे सबसे मुख्य सवाल पूछा कि “साल 1966 में प्रांतीय सरकार का नाम हटाकर आपका नाम किस अधिकारी के लिखित आदेश से दर्ज हुआ, उसका सर्टिफिकेट दिखाएं?” तो अनावेदक पक्ष कोई भी प्रामाणिक दस्तावेज पेश नहीं कर सका। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी सरकारी जमीन को निजी घोषित करने के लिए सक्षम प्राधिकारी का आदेश अनिवार्य है, जो कि रिकॉर्ड में गायब था।
एसडीएम कोर्ट का अंतिम फैसला: “तालाब है, पानी का निस्तार सुरक्षित रहेगा”
मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता 1959 (MP Land Revenue Code) के तहत मिली शक्तियों का उपयोग करते हुए एसडीएम कोर्ट ने इस अवैध प्रविष्टि को खारिज कर दिया। कोर्ट ने आदेश जारी किया है कि:
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राजस्व रिकॉर्ड में वर्ष 1963-64 की स्थिति को बहाल करते हुए जमीन को दोबारा ‘प्रांतीय सरकार’ के नाम दर्ज किया जाए।
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खसरे के कैफियत (रिमार्क) कॉलम में बड़े और साफ अक्षरों में लिखा जाए— “तालाब है, पानी का निस्तार सुरक्षित।” ताकि भविष्य में इसे कोई बेच या पाट न सके।








