आंखों देखी: कटनी में रसोई गैस वितरण चरमराया, घंटों लाइन के बाद भी खाली हाथ लौट रहे उपभोक्ता, गुप्ता गैस में तो युद्ध के हालात पर दिया जा रहा मैडम का ज्ञान

कटनी। शहर की सबसे पुरानी एलपीजी एजेंसियों में गिनी जाने वाली गुप्ता ब्रदर्स गैस एजेंसी की बदहाल व्यवस्था अब उपभोक्ताओं के सब्र की सीमा तोड़ रही है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि सुबह 6 बजे से कतार में लगने के बावजूद लोगों को दोपहर तक गैस सिलेंडर नसीब नहीं हो रहा।

विगत 23 मार्च को बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को गैस रिफिलिंग का एसएमएस मिला, लेकिन जब वे एजेंसी पहुंचे तो वहां अव्यवस्था का आलम देखने को मिला। सुबह 7 बजे से लाइन में खड़े लोग दोपहर 12 बजे तक इंतजार करते रहे, लेकिन सिलेंडर वितरण शुरू ही नहीं हुआ।

बुजुर्ग, महिलाएं और छोटे बच्चे घंटों धूप में खड़े रहे, जबकि एजेंसी के जिम्मेदार कर्मचारी नदारद दिखे।
स्थिति तब और बिगड़ी जब आक्रोशित उपभोक्ताओं ने विरोध जताया। एजेंसी की एक महिला कर्मचारी ने सामने आकर गैस सप्लाई में देरी का कारण पश्चिम एशिया के हालात और होरमुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही पर असर बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की। उपभोक्ताओं ने इसे “बेतुका और गैर-जिम्मेदाराना जवाब” बताते हुए नाराजगी जताई।

आरोप यह भी है कि एजेंसी के कुछ कर्मचारी अलग-अलग बहाने बनाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। वहीं, एजेंसी प्रबंधन का रवैया भी सवालों के घेरे में है। उपभोक्ताओं का कहना है कि शिकायत करने पर उन्हें कलेक्टर के पास जाने की नसीहत दी जाती है, वह भी धमकी भरे अंदाज में।
सबसे गंभीर आरोप गैस सिलेंडरों की कालाबाजारी को लेकर हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सिलेंडर ब्लैक में बेचे जा रहे हैं या फिर प्रभावशाली लोगों, प्रशासनिक तंत्र और खास वर्ग को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि आम उपभोक्ता दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

हालांकि शहर की अन्य गैस एजेंसियों की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है, लेकिन इस एजेंसी में कनेक्शनों की अधिक संख्या और प्रभावशाली परिवार से जुड़े होने के कारण अव्यवस्था और मनमानी ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे रही है।
सबसे बड़ा सवाल प्रशासन पर खड़ा हो रहा है। बंद कमरों में बैठकों और दावों के बावजूद जमीनी हकीकत बदतर है। अब तक जिला प्रशासन और संबंधित विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आई है।

जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी लोगों को अखर रही है। उपभोक्ताओं का कहना है कि उनकी समस्याओं को लेकर न तो कोई पहल की गई और न ही जिम्मेदारों पर दबाव बनाया गया।

स्पष्ट है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। रसोई गैस जैसी बुनियादी जरूरत के लिए लोगों को इस तरह जूझना पड़े, यह प्रशासनिक विफलता का सीधा उदाहरण है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर मुद्दे पर कब जागते हैं।

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