हरतालिका तीजः अद्वितीय सौभाग्य की कामना का पर्
कटनी-हरतालिका तीज का पर्व पौराणिक काल से विवाहित महिलाएं करती आ रही है। इससे जुड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं न केवल जीवंतता का प्रवाह करती है, अपने दांपत्य के रिश्ते को और भी प्रगाढ़ करने के लिए प्रेरित करती है। इससे जुड़ी परंपराओं और पूजन विधान के बारे में जानिए हरतालिका तीज उत्तर और मध्य भारत के प्रमुख व्रत-त्योहारों में से एक है, जो विशेष रूप से सुहागन महिलाओं और अविवाहित कन्याओं के लिए अत्यंत श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। यह हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है।
व्रत-पूजन मुहूर्तः इस वर्ष भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का प्रारंभकल यानी 25 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 34 मिनट से हो चुका है। इस तिथि का समापन आज यानी 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 54 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, हरतालिका तीज का पर्व आज ही मनाना उचित है। यह व्रत न केवल वैवाहिक जीवन में प्रेम, सामंजस्य और सौभाग्य लाने के लिए किया जाता है, बल्कि इसे अटूट आस्था, त्याग और समर्पण का पर्व भी माना जाता है। जुड़ी हैं कई परंपराएं-मान्यताएं: हरतालिका दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘हर’ का अर्थ है हरण करना और ‘तालिका’ का अर्थ है सखी। मान्यता है कि पार्वती जी की सखी उन्हें पिता के घर से हरण करके जंगल में ले गई थी। इसीलिए इस पूजन को हरतालिका कहते हैं। हरतालिका तीज पर्व का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन से भी है। इसलिए इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाते हुए, झूला झूलती हैं, श्रंगार करती हैं और विधिवत पूजा-पाठ के माध्यम से इस पावन पर्व को मनाती हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से विवाहित जीवन में सुख-समृद्धि आती है और अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर प्राप्त होता है।

