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ज्ञानवापी विवाद: 20 मिनट में ही बेनतीजा खत्म हुई वाराणसी लोक अदालत की बैठक; दोनों पक्षों का मध्यस्थता से साफ इनकार

ज्ञानवापी विवाद: 20 मिनट में ही बेनतीजा खत्म हुई वाराणसी लोक अदालत की बैठक; दोनों पक्षों का मध्यस्थता से साफ इनकार

ज्ञानवापी विवाद: 20 मिनट में ही बेनतीजा खत्म हुई वाराणसी लोक अदालत की बैठक; दोनों पक्षों का मध्यस्थता से साफ इनकार

वाराणसी: उत्तर प्रदेश के चर्चित ज्ञानवापी मस्जिद-श्रृंगार गौरी विवाद को लेकर मंगलवार (14 जुलाई, 2026) को वाराणसी के जिला न्यायालय परिसर स्थित मेडिएशन सेंटर (मध्यस्थता केंद्र) में बुलाई गई बैठक पूरी तरह बेनतीजा समाप्त हो गई है। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने आपसी बातचीत या मध्यस्थता के जरिए किसी भी समझौते पर पहुंचने से साफ इनकार कर दिया है।

दोनों पक्षों के कड़े रुख के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि इस विवाद का फैसला केवल और केवल अदालती मुकदमे की कानूनी प्रक्रिया के जरिए ही होगा।

क्यों बुलाई गई थी यह बैठक? (सुप्रीम कोर्ट की पहल)

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने ‘समाधान समारोह-2026’ (SAMADHAN SAMAROH) पहल के तहत एक विशेष लोक अदालत की रूपरेखा तैयार की थी।

  • मकसद: कोर्ट का उद्देश्य था कि अगस्त में होने वाली विशेष लोक अदालत से पहले दोनों पक्ष आपसी सहमति से सुलह का कोई रास्ता निकाल सकें।

  • शामिल पक्षकार: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वाराणसी लोक अदालत में ज्ञानवापी से जुड़े 4 प्रमुख मामलों (जिसमें राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, सोमनाथ व्यास आदि के वाद शामिल हैं) के हिंदू पक्षकार, उनके अधिवक्ता सुधीर त्रिपाठी व मदन मोहन यादव और अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के वकील शामिल हुए।

20 मिनट में ही क्यों टूटी बातचीत की उम्मीद?

कड़ी सुरक्षा के बीच लोक अदालत के मनोरंजन कक्ष में शुरू हुई यह बैठक महज 20 मिनट भी नहीं चल सकी। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के दावों को सिरे से खारिज कर दिया:

 हिंदू पक्ष का तर्क: ‘बिना शर्त खाली हो परिसर’

हिंदू पक्ष की वादिनी रेखा पाठक और उनके वकीलों ने साफ किया कि ज्ञानवापी कोई विवादित स्थल नहीं बल्कि आदि विश्वेश्वर का मूल मंदिर है।

“ज्ञानवापी हमारा मंदिर है और इसके प्रमाण आज भी वहां मौजूद हैं। हम केवल इस शर्त पर बात कर सकते हैं कि मुस्लिम पक्ष वहां से अपना दावा छोड़ दे ताकि वहां भव्य मंदिर का निर्माण हो सके। जब वे इसके लिए तैयार नहीं हैं, तो मध्यस्थता का कोई मतलब नहीं रह जाता।”

 मुस्लिम पक्ष का तर्क: ‘कानूनी लड़ाई ही एकमात्र रास्ता’

दूसरी ओर, अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी की तरफ से पेश हुए वकीलों (मुमताज अहमद, रईस अंसारी व एखलाक अहमद) ने मध्यस्थता के प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया।

“यह मामला बेहद संवेदनशील है और कोर्ट में विचाराधीन (Sub-judice) है। ऐसे गंभीर धार्मिक मामलों को मध्यस्थता या लोक अदालत के जरिए नहीं सुलझाया जा सकता। अदालत का जो भी अंतिम फैसला होगा, हम उसी को मानेंगे। हम मस्जिद पर अपना दावा नहीं छोड़ सकते।”

अब आगे क्या होगा?

  • सुप्रीम कोर्ट में टली वार्ता: इस बैठक के विफल होने के बाद अब आगामी 21, 22 और 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के तत्वावधान में होने वाली विशेष लोक अदालत की मध्यस्थता की गुंजाइश खत्म हो गई है।

  • अदालती सुनवाई: वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की कुछ अर्जियों पर सुनवाई रोक रखी थी, जिसकी अगली तारीख 27 जुलाई तय की गई है। हिंदू पक्ष अब सुप्रीम कोर्ट में इस मध्यस्थता के विफल होने की जानकारी देकर नियमित कानूनी सुनवाई तुरंत शुरू करने की अपील करेगा।

  • मस्जिद कमेटी की उलझन: अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के संयुक्त सचिव सैयद मोहम्मद यासीन का कहना है कि कमेटी के खिलाफ अलग-अलग अदालतों में करीब 36 मुकदमे दायर हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष से बातचीत कर सहमति बनाना वैसे भी व्यावहारिक नहीं था।

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वाराणसी के अलावा मथुरा (श्री कृष्ण जन्मभूमि) और संभल के मामलों में भी मध्यस्थता की कोशिशें नाकाम रही हैं, जिससे यह साफ है कि उत्तर प्रदेश के इन बड़े धार्मिक विवादों का हल अब केवल देश की उच्च न्यायपालिका ही करेगी।

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