सरकार ने पहली बार अस्पतालों में एंटीबायोटिक खपत मापने के निर्देश जारी किए, सभी संस्थानों को एक समान फॉर्मेट में देना होगा डाटा

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सरकार ने पहली बार अस्पतालों में एंटीबायोटिक खपत मापने के निर्देश जारी किए, सभी संस्थानों को एक समान फॉर्मेट में देना होगा डाटा। भारत में एंटीबायोटिक के बढ़ते और बिना ज़रूरत उपयोग को रोकने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है।

 

सरकार ने पहली बार अस्पतालों में एंटीबायोटिक खपत मापने के निर्देश जारी किए, सभी संस्थानों को एक समान फॉर्मेट में देना होगा डाटा

स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन स्वास्थ्य महानिदेशालय (DGHS) ने राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के साथ मिलकर पहली बार 51 पन्नों का विस्तृत दिशानिर्देश (SOP) जारी किया है, जिसके अनुसार देशभर के सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों को अब एक तय फॉर्मेट में एंटीमाइक्रोबियल खपत का रिकॉर्ड बनाए रखना होगा।

यह कदम राष्ट्रीय रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) नियंत्रण कार्यक्रम का हिस्सा है।
नए SOP के तहत अस्पतालों को अब अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार डेटा देना होगा-
यानि “हर 100 बिस्तर पर कितनी एंटीबायोटिक दवा उपयोग हुई” इसके आधार पर रिपोर्ट केंद्र को भेजनी होगी।

आईसीयू और बच्चों के वार्ड सबसे ज्यादा जोखिम में

DGHS ने अपने दिशानिर्देशों में साफ कहा है कि आईसीयू (ICU) और पीडियाट्रिक वार्ड सबसे अधिक संवेदनशील हैं:

ICU में गंभीर मरीज भर्ती होते हैं, जहां डॉक्टर अक्सर मेरोपेनेम, पिपेरसिलिन-टाजोबैक्टम, कोलिस्टिन जैसी शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाओं का ज्यादा उपयोग करते हैं।

राष्ट्रीय एएमसी निगरानी नेटवर्क (NAC-NET) की रिपोर्ट बताती है कि कई अस्पतालों में ICU बेड कम हैं, लेकिन वहां एंटीबायोटिक खपत असामान्य रूप से बहुत अधिक है।

बच्चों के लिए दवाओं की खुराक और प्रभाव अलग होते हैं, लेकिन कई अस्पताल वयस्कों वाले ही दवा पैटर्न बच्चों पर भी लागू कर देते हैं, जिससे जोखिम बढ़ता है।

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सरकार के इस नए निर्देश का लक्ष्य है कि देशभर में एंटीबायोटिक उपयोग का सटीक मूल्यांकन, गलत उपयोग पर नियंत्रण, और AMR के खतरे को कम करना।