अदालतें समाज या माता-पिता के अहंकार के लिए सुपर गार्जियन नहीं’: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पूरे देश के लिए नजीर
अदालतें समाज या माता-पिता के अहंकार के लिए सुपर गार्जियन नहीं': मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पूरे देश के लिए नजीर

अदालतें समाज या माता-पिता के अहंकार के लिए सुपर गार्जियन नहीं’: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पूरे देश के लिए नजीर
जबलपुर: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (High Court of Madhya Pradesh) के दो हालिया फैसलों ने भारतीय न्यायपालिका और संवैधानिक अधिकारों के इतिहास में एक नई लकीर खींच दी है। ये निर्णय केवल प्रदेश की सीमाओं तक सीमित न्यायिक घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इन्होंने पूरे देश के सामने संविधान की मूल भावना को बेहद प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया है। इन ऐतिहासिक फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायपालिका की निर्भीक स्वायत्तता में ही निहित है।
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हम सुपर गार्जियन नहीं… -बालिगों की स्वतंत्रता पर दो टूक
एक बेहद महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना और दो टूक शब्दों में कहा:
“कोई भी बालिग युवक और युवती अपनी इच्छा से जीवन जीने और अपना जीवनसाथी चुनने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं। अदालतें किसी भी माता-पिता के अहंकार (Ego) या सामाजिक दबाव की तुष्टि के लिए किसी ‘सुपर गार्जियन’ (Super Guardian) की भूमिका नहीं निभा सकतीं।”
न्यायालय का यह कड़ा संदेश केवल याचिका दायर करने वाले एक युगल (Couple) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के उन सभी बालिग नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की एक मजबूत पुनर्पुष्टि है, जिन्हें अपनी मर्जी और पसंद के कारण पारिवारिक या सामाजिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। अदालतें समाज या माता-पिता के अहंकार के लिए सुपर गार्जियन नहीं’: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पूरे देश के लिए नजीर
संविधान के अनुच्छेद 21 को मिली नई ताकत
हाई कोर्ट के इन फैसलों ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life and Personal Liberty – जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) को और अधिक मजबूती दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद:
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पारिवारिक हस्तक्षेप पर रोक: बालिग होने के बाद किसी भी व्यक्ति के निजी फैसलों में परिवार या समाज जबरन अड़ंगा नहीं लगा सकता।
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अदालतों का रुख साफ: न्यायपालिका सामाजिक रूढ़ियों के बजाय केवल और केवल संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए काम करेगी।
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देशभर में नजीर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के इस कड़े रुख का असर अब देश की अन्य अदालतों में चल रहे समान मामलों पर भी देखने को मिलेगा।
हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून की नजर में सामाजिक दबाव या किसी का व्यक्तिगत अहंकार किसी नागरिक की संवैधानिक आजादी से बड़ा कभी नहीं हो सकता।








