सीएसपी की फील्ड आधारित कार्यप्रणाली से होने लगीं शिकवा शिकायत !

कटनी। शहर की कानून-व्यवस्था की कमान संभालने वाली सीएसपी नेहा पच्चीसिया के कार्यशैली को लेकर चर्चा है कि वह फील्ड पर ज्यादा रहती हैं स्वाभाविक है ऐसे में ऑफिस में तो कम ही दिखेंगी। बस यहीं से आरोप लगने भी शुरू हो जाते हैं। वैसे इसी शहर के लोगों ने पूर्व सीएसपी के कार्यकाल को भी देखा तो वहीं वर्तमान सीएसपी के कामकाज को भी नजदीक से समझ रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कार्यशैली बदली है और उसी बदलाव से सीएसपी के विरुद्ध एक सोची समझी रणनीति के तहत शिकवे-शिकायतें भी जन्म ले रही हैं।

 

बता दें कि पूर्व सीएसपी ने अपने कार्यकाल में “न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर” की कहावत को व्यवहार में उतारते हुए अपेक्षाकृत संतुलित और सीमित दायरे में काम किया। उनका फोकस मुख्य रूप से संवेदनशील मामलों, विशेषकर नवविवाहिताओं की मौत से जुड़े मर्ग जांच जैसे प्रकरणों पर केंद्रित रहा। वे अनावश्यक हस्तक्षेप या अतिरिक्त सक्रियता से दूरी बनाए रखती थीं।

 

इसके विपरीत, वर्तमान सीएसपी नेहा पच्चीसिया पदभार संभालने के बाद अपने क्षेत्राधिकार के थानों में सक्रिय दिखाई दे रही हैं। ऑफिस से लेकर मोहकमे तक चर्चा है कि वह न केवल फील्ड में लगातार मौजूद रहती हैं, बल्कि अपने कार्यालयीन दायित्वों को भी पूरी गंभीरता से निभाने का प्रयास कर रही हैं। एक फील्ड अधिकारी से जितना समय मैदान में अपेक्षित होता है, उतना ही समय वे कार्यालयीन कार्यों को भी दे रही हैं।

 

दरअसल यहीं से शिकायतों की शुरुआत होती है। आम नागरिकों और फरियादियों का कहना है कि जब वे सीएसपी कार्यालय पहुंचते हैं, तो कई बार मैडम फील्ड में होने के कारण उपलब्ध नहीं मिलतीं। इससे लोगों में यह धारणा बन जाती है कि अधिकारी कार्यालय में कम बैठती हैं, जबकि हकीकत इससे अलग है।

 

तो अब तो का सुझाव यह भी आने लगे कि है कि क्यों न इस तरह की अनावश्यक शिकायतों से बचने के लिए सीएसपी को भी अपने कार्यालय में जनसुनवाई का दिन और समय निर्धारित कर सार्वजनिक सूचना चस्पा कर देनी चाहिए। ठीक उसी तरह, जैसे कलेक्ट्रेट के कई विभागों में अधिकारी पूर्व निर्धारित समय पर आम जनता से मिलते हैं। भले ही वह बेहद सीमित दिन या समय ही क्यों न होता हो।

 

वैसे कटनी में एक चिंता यह भी है कि शिकायत करना एक तरह का ‘फैशन’ बनता जा रहा है। लोग कलेक्ट्रेट या पुलिस अधीक्षक कार्यालय की आवक-जावक शाखा में एक आवेदन देकर उस पर सील, हस्ताक्षर करा लेते हैं और फिर उसी कागज के आधार पर सोशल मीडिया पर प्रशासन की जमकर छीछालेदर शुरू हो जाती है। ऐसी प्रवृत्तियां न तो व्यवस्था के हित में हैं और न ही समाज के।

 

कुल मिलाकर, सीएसपी नेहा पच्चीसिया की सक्रियता को नकारा नहीं जा सकता, पर क्या उसे तय समय-सारणी के साथ भी जोड़ा जाए? यह प्रश्न है। वैसे बीते दिनों में सीएसपी कार्यालय में जनता की शिकायतें कम होने की बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता पर यह तो कटनी है साहब यहां आफिस में बैठो तो फील्ड पर न रहने का आरोप और फील्ड पर रहो तो ऑफिस की कुर्सी खाली रहने का…! बेचारा अधिकारी अब करे तो क्या करे।

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