भारतीय रेलवे का बड़ा फैसला: अब ट्रेन के पुर्जों पर लिखनी होगी पूरी जानकारी, नियम तोड़ा तो वेंडर का पूरा लॉट होगा रिजेक्ट
भारतीय रेलवे का बड़ा फैसला: अब ट्रेन के पुर्जों पर लिखनी होगी पूरी जानकारी, नियम तोड़ा तो वेंडर का पूरा लॉट होगा रिजेक्ट
नई दिल्ली: ट्रेनों में लगातार सामने आ रही तकनीकी खराबियों और हादसों की रोकथाम के लिए भारतीय रेलवे ने एक बेहद कड़ा कदम उठाया है। हाल ही में हुए कई हादसों व ब्रेकडाउन की जांच के दौरान यह बात सामने आई थी कि कई खराब पुर्जों (पार्ट्स) पर उन्हें बनाने वाली कंपनी का नाम, सीरियल नंबर या बैच नंबर मौजूद नहीं था। इस वजह से घटिया क्वालिटी का सामान सप्लाई करने वाले वेंडर्स की पहचान करना और उन पर कार्रवाई करना मुश्किल हो रहा था।
इस समस्या से निपटने के लिए अनुसंधान डिजाइन एवं मानक संगठन (RDSO) ने सभी जोनल रेलवे, वैगन निर्माताओं और इंस्पेक्शन एजेंसियों के लिए पुर्जों की वॉरंटी व मार्किंग को लेकर नए और सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
अब पुर्जों पर लिखनी होंगी ये जरूरी जानकारियां
रेलवे को सप्लाई किए जाने वाले हर छोटे-बड़े पुर्जे पर निम्नलिखित जानकारियां अंकित करना अनिवार्य कर दिया गया है:
निर्माता कंपनी का नाम व कोड
सीरियल नंबर और बैच नंबर
निर्माण का महीना और साल
यह मार्किंग RDSO के तय मानकों, आकार और गहराई के अनुसार होनी चाहिए ताकि इसे आसानी से पढ़ा जा सके।
इन सुरक्षा-संबंधी पुर्जों पर रहेगी विशेष नजर
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, सुरक्षा से जुड़े अति-संवेदनशील पार्ट्स की चेकिंग बेहद कड़ाई से की जाएगी:
कपलर और ड्राफ्ट गियर
ब्रेक ब्लॉक और कंप्रेस्ड-एयर ब्रेक उपकरण
स्प्रिंग्स, साइड बियरर, एडॉप्टर
ब्रेक बीम, बोगी और वियर प्लेट्स
सामान मिलते समय, ट्रेन में फिट करते समय और वर्कशॉप में रैंडम चेकिंग के जरिए मार्किंग की पड़ताल की जाएगी।
नियम तोड़ा तो वेंडर्स को भुगतना होगा भारी नुकसान
अगर चेकिंग के दौरान किसी भी पुर्जे पर मार्किंग अधूरी, गलत या पढ़ने योग्य नहीं पाई जाती है, तो रेलवे निम्नलिखित कड़ी कार्रवाई करेगा:
पूरा लॉट रिजेक्ट: केवल खराब पुर्जा ही नहीं, बल्कि उस लॉट का पूरा का पूरा सामान रिजेक्ट कर दिया जाएगा।
फ्री रिप्लेसमेंट: वॉरंटी नियमों के तहत वेंडर को रिजेक्ट हुआ पूरा सामान अपने खर्चे पर मुफ्त में बदलकर देना होगा।
परिवहन खर्च: रिजेक्ट सामान को वापस ले जाने और नया सामान लाने का पूरा ट्रांसपोर्टेशन खर्च भी वेंडर कंपनी को ही उठाना पड़ेगा।