नई दिल्ली । ममता सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका: मतगणना पर्यवेक्षकों की नियुक्ति पर दखल से इनकार, चुनाव आयोग की शक्तियां बरकरार।

पश्चिम बंगाल में मतगणना (Counting) से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) को देश की सर्वोच्च अदालत से तगड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने मतगणना पर्यवेक्षकों (Counting Observers) की नियुक्ति को चुनौती देने वाली टीएमसी की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग (Election Commission) को अपने अधिकारी चुनने का पूर्ण अधिकार है।

कपिल सिब्बल की दलीलें: टीएमसी ने उठाए 4 मुख्य मुद्दे

टीएमसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कोर्ट में दलीलें पेश कीं। उन्होंने आयोग की मंशा और प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए चार प्रमुख बिंदु रखे:

  1. देरी से जानकारी: सिब्बल ने कहा कि जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) को नोटिस 13 अप्रैल को ही जारी हो गया था, लेकिन इसकी जानकारी हमें 29 अप्रैल को मिली। इतनी देरी क्यों हुई?

  2. गड़बड़ी की आशंका: टीएमसी ने अंदेशा जताया कि हर बूथ पर गड़बड़ी की योजना बनाई जा रही है। उन्होंने सवाल किया कि अधिकारियों को ऐसे ‘ऑपरेशन’ के निर्देश कहाँ से मिल रहे हैं?

  3. दोहरा पर्यवेक्षण: सिब्बल ने दलील दी कि जब हर बैठक और बूथ पर पहले से ही एक केंद्रीय सरकारी अधिकारी ‘माइक्रो ऑब्जर्वर’ के रूप में तैनात है, तो एक और अतिरिक्त केंद्रीय अधिकारी की क्या आवश्यकता है?

  4. निष्पक्षता पर सवाल: पार्टी ने आशंका जताई कि अतिरिक्त केंद्रीय अधिकारियों की मौजूदगी से मतगणना की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

अदालत ने टीएमसी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि चुनाव की शुचिता बनाए रखने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति चुनाव आयोग का विशेषाधिकार है। कोर्ट ने इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से साफ मना कर दिया, जिसे चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी राहत और टीएमसी के लिए रणनीतिक हार माना जा रहा है।