सोशल मीडिया के कंटेंट पर रहेगी नजर, डाटा सुरक्षा बिल के पास होते ही खत्म हो जाएगी प्राइवेसी? क्या है ये विधेयक, क्यों हो रहा विरोध?

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सोशल मीडिया के कंटेंट संसद की संयुक्त समिति (जेसीपी) ने निजी डाटा सुरक्षा विधेयक में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को पब्लिशर्स के रूप में मानने के साथ-साथ उससे जुड़े डाटा की निगरानी और जांच के अधिकार को भी विधेयक के दायरे लाने की सिफारिश की है।

दो साल के विचार-विमर्श के बाद इस विधेयक में सुधार से जुड़े सुझावों को स्वीकार कर लिया गया है. दरअसल, लोगों के निजी डाटा की सुरक्षा और डाटा सुरक्षा प्राधिकरण की स्थापना के मकसद से यह विधेयक 2019 में लाया गया था. इसके बाद इस विधेयक को छानबीन और आवश्यक सुझावों के लिए इस संसद की संयुक्त समिति (जेसीपी) के पास भेज दिया गया था।

जिसके बाद समिति ने इसमें बदलावों को लेकर सुझाव दिए, जिसे सोमवार को स्वीकार कर लिया गया. अब इसे कानून बनाने के लिए संसद में पेश किया जाना है।

व्यक्तिगत डाटा संरक्षण विधेयक के दायरे को बढ़ाने के लिए संसदीय समिति ने अपने सुझावों में गैर-व्यक्तिगत डाटा और इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर द्वारा जुटाए जाने वाले डाटा को भी इसके अधिकार क्षेत्र में शामिल किया है. साथ ही सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी इसमें शामिल करने का सुझाव दिया गया है।

 

समिति के सुझावों में उस प्रावधान को बरकरार रखा गया है, जो सरकार को अपनी जांच एजेंसियों को इस प्रस्तावित कानून के दायरे से मुक्त रखने का अधिकार देता है. संसद की संयुक्त समिति ने इस विधेयक को लेकर कुल 93 अनुशंसाएं की हैं. जेसीपी का कहना है कि इस विधेयक में सरकार के कामकाज और लोगों की निजता की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने का पूरा प्रयास किया गया है.

डिजिटल अर्थव्यवस्था पर होगा सीधा असर

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश समेत कई विपक्षी नेताओं ने समिति की सिफारिशों के कुछ प्रावधान और कुछ अन्य बिंदुओं को लेकर अपनी ओर से असहमति का नोट भी दिया है. हालांकि, इसके बावजूद आगामी शीतकालीन सत्र में इस बिल को पेश किए जाने की संभावना है. पीपी चौधरी की अध्यक्षता में, संसद की संयुक्त समिति (जेसीपी) ने विधेयक पर सिफारिशों को अपनाने के लिए सोमवार को बैठक की, जिसका देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ने वाला है।

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कानून के अधिकार में होगा सोशल मीडिया का व्यक्तिगत डाटा

समिति के सुझाव ये दर्शाने के लिए काफी हैं कि जेसीपी न केवल व्यक्तिगत डाटा बल्कि गैर-व्यक्तिगत डाटा को भी शामिल करने के लिए कानून के दायरे को व्यापक बनाने के पक्ष में है. प्रस्तावित डाटा संरक्षण प्राधिकरण (डीपीए), यह मानता है कि गैर-व्यक्तिगत डाटा को संभालने के लिए भी कोई व्यवस्था होनी चाहिए और इसके लिए जेसीपी को लगता है कि भविष्य में गैर-व्यक्तिगत डाटा पर आगे की नीति को इस बिल का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, न कि एक अलग कानून. यानी कुल मिलाकर अन्य औद्योगिक डाटाबेस के अलावा, गैर-व्यक्तिगत डाटा में प्रस्तावित बदलावों के तहत हमारा और आपका व्यक्तिगत डाटा भी शामिल होगा।

डिजिटली डाटा जुटाने वाले हार्डवेयर निर्माताओं पर कोई रोक नहीं

समिति के सुझावों के मुताबिक डिजिटल/सॉफ्टवेयर कंपनियों के अलावा, इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर (टेलीकॉम गियर्स, आईओटी आदि) द्वारा जुटाए जाने वाले डाटा को भी इस कानून के दायरे में लाया जाएगा. साथ ही डिजिटली डाटा जुटाने वाले हार्डवेयर निर्माताओं पर रोक लगाने का कोई प्रावधान नहीं है. बल्कि यह बिल कानून बनने के बाद डीपीए को हार्डवेयर निर्माताओं और संबंधित संस्थाओं द्वारा डाटा प्रबंधन के लिए नियम बनाने की अनुमति देगा।

एक तरह से, डीपीए को निगरानी, ​​परीक्षण और प्रमाणन (सर्टिफिकेशन) प्रदान करने के लिए एक ढांचा तैयार करने की अनुमति देगा ताकि हार्डवेयर उपकरणों की प्रामाणिकता को सुनिश्चित किया जा सके, जिससे लोगों की निजता का उल्लंघन हो सकता है।

सोशल मीडिया पर पोस्ट किए जाने वाले कंटेंट पर रहेगी नजर

जेसीपी यानी समिति चाहती है कि सोशल मीडिया के बिचौलियों को फिर से डिजाइन करके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के रूप में इस बिल के अधिकार क्षेत्र में लाया जाए. साथ ही सुझाव ये भी है कि सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (जो बिचौलियों के रूप में कार्य नहीं करते हैं) को पब्लिशर्स के रूप में माना जाए, जिन पर पब्लिश होने वाली सामग्री की पूरी जवाबदेही होती है. इनके लिए समिति ने सुझाव दिया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पब्लिश होने वाले या पोस्ट किए जाने वाले कंटेंट की निगरानी व नियमों के लिए भी एक ऑथोरिटी बनाई जाए.

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छोटे फर्मों को छूट

हालांकि, समिति ने छोटे फर्मों को इससे अलग रखने की बात कही है. इसके लिए, डीपीए को कानून बनाने की बात कही गई है जिसके तहत एक सीमा तय कर डाटा जुटाने से जुड़ीं छोटी कंपनियों को अपवाद के तौर पर सूचीबद्ध किया जा सके, ताकि एमएसएमई के तहत आने वाली फर्मों के विकास में बाधा न आए.

ऐसा माना जाता है कि इस बिल में बदलाव के लिए सुझाव देने वाली संसदीय समिति ने डाटा जुटाने वाली फर्मों को 24 महीने का समय देने की बात कही है ताकि वो कानून के हिसाब से अपनी नीतियों, बुनियादी ढांचे और प्रोसेस को तैयार कर सकें. समिति की रिपोर्ट में निजी क्षेत्र की कंपनियों को नई डाटा सुरक्षा व्यवस्था यानी इस बिल के दायरे में आने के लिए दो साल का समय देने का सुझाव दिया है, जबकि सरकारों या उनकी एजेंसियों के लिए ऐसा नहीं किया गया है.

कई सांसद इस बिल के खिलाफ

कांग्रेस के चार सांसदों, तृणमूल कांग्रेस के दो और बीजू जनता दल (बीजद) के एक सांसद ने समिति की कुछ सिफारिशों को लेकर अपनी असहमति जताई. निजी डाटा सुरक्षा विधेयक के मुताबिक, केंद्र सरकार राष्ट्रीय हित की सुरक्षा, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था और देश की संप्रभुता एवं अखंडता की रक्षा के लिए अपनी एजेंसियों को इस प्रस्तावित कानून के प्रावधानों से छूट दे सकती है. विपक्षी सदस्यों की ओर से मुख्य रूप से इसको लेकर विरोध जताया गया कि केंद्र सरकार को अपनी एजेंसियों को कानून के दायरे से छूट देने के लिए बेहिसाब ताकत दी जा रही है।

 

राष्ट्रीय सुरक्षा के विषयों पर अनुमति की जरूरत नहीं

समिति के प्रमुख पीपी चौधरी ने कहा कि सरकार और उसकी एजेंसियों की डाटा को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ाने से उसी स्थिति में छूट दी गई है, जब इसका उपयोग लोगों के फायदे के लिए हो. उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर किसी तरह की अनुमति की जरूरत नहीं होगी. उन्होंने कहा, ‘सदस्यों और दूसरे संबंधित पक्षों के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद यह रिपोर्ट आई है. मैं सहयोग के लिए सभी सदस्यों का आभार प्रकट करता हूं. इस प्रस्तावित कानून का वैश्विक असर होगा और डाटा सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानक भी तय होंगे.’

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इन नेताओं ने जताया विरोध

राज्यसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक जयराम रमेश ने कहा कि उन्हें असहमति का यह विस्तृत नोट देना पड़ा, क्योंकि उनके सुझावों को स्वीकार नहीं किया गया और वह समिति के सदस्यों को मना नहीं सके. तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओब्रायन और महुआ मोइत्रा ने भी असहमति का नोट दिया. कांग्रेस के अन्य सदस्यों, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई और विवेक तन्खा तथा बीजद सांसद अमर पटनायक ने भी असहमति का नोट दिया.

सुनिश्चित नहीं है निजता के अधिकार की सुरक्षा!

समिति में शामिल तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों ने भी असहमति का नोट सौंपा और कहा कि यह विधेयक स्वभाव से ही नुकसान पहुंचाने वाला है. उन्होंने समिति के कामकाज को लेकर भी सवाल किया. सूत्रों के मुताबिक, ओब्रायन और महुआ ने असहमति के नोट में आरोप लगाया कि यह समिति अपनी जिम्मेदारी से विमुख हो गई और संबंधित पक्षों को विचार-विमर्श के लिए पर्याप्त समय एवं अवसर नहीं दिया गया. सूत्रों के अनुसार, इन सांसदों ने विधेयक का यह कहते हुए विरोध किया कि इसमें निजता के अधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उचित उपाय नहीं किए गए हैं.

राज्यसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक रमेश ने असहमति के नोट में यह भी सुझाव दिया कि विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण धारा 35 तथा धारा 12 में संशोधन किया जाए. उन्होंने कहा कि धारा 35 केंद्र सरकार को असीम शक्तियां देती हैं कि वह किसी भी सरकारी एजेंसी को इस प्रस्तावित कानून के दायरे से बाहर रख दे. कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने समिति के कामकाज को लेकर असहमति का विस्तृत नोट सौंपते हुए दावा किया कि यह प्रस्तावित अधिनियम, कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाएगा.

 

 

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