तालिबान खुद ही अफीम की खेती करना चाहता है!

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खेती-किसानी का जिक्र आते ही एक आम हिंदुस्तानी किसान की छवि जेहन में कौंध जाती है. वह हिंदुस्तानी किसान जो ट्रैक्टर-बैलगाड़ी पर बैठा. सिर पर गमछा लपेटे हुए अक्सर खेत-खलिहानों में हमें-आपको दिखाई दे जाता है. ऐसे में जानना जरूरी हो जाता है एक उस खेती या फसल के बारे में, जो हर हिंदुस्तानी किसान के लिए करना आसान नहीं है. इस फसल का एक पौधा भी अगर सरकार की इजाजत के बिना किसी किसान ने खेत में लगा लिया और वो पकड़ा गया. तो ऐसे किसान को उसके खेत में मौजूद वो एक अदद ‘गैर-कानूनी पौधा’ ही जेल की हवा तक खिलवा सकता है.

आईए जानते हैं आखिर ऐसी कौन सी खेती या फसल है, जो बिना सरकार की इजाजत के भारतीय किसान कर ही नहीं सकता है. जबकि इसी खेती की पैदावार के लिए अफगानिस्तान में तालिबानी हुकूमत खुलेआम करने-कराने पर अमादा है. जब से अफगानिस्तान में तालिबानी हुकूमत काबिज हुई है तब से ही वो वहां, इस फसल की पैदावार के लिए नई-नई जुगत तलाशने में जुटी है. यह खेती है ‘अफीम’ (Afeem Farming Business) की. जबकि भारत जैसे विशाल और कृषि-प्रधान देश में सरकार की अनुमति के बिना अफीम की खेती करना ‘गैर-कानूनी’ है.

85 फीसदी अफीम खेती अफगानिस्तान में

इस खेती के लिए अनुमति भारत सरकार से मिलती है. जबकि इसकी पैदावार पर नजर रखने की जिम्मेदारी नारकोटिक्स-ड्रग विभाग की होती है. ताकि अफीम की स्मग्लिंग होने से रोकी जा सके. हिंदुस्तानी हुकूमत ने हाल ही में अफीम की खेती के लिए साल 2020-2021 के लिए नई नीति भी जारी कर दी है. दुनिया भर में अगर अफीम की खेती (पैदावार) और खपत पर नजर डालें तो अफीम की खेती दुनिया में सबसे ज्यादा अफगानिस्तान में होती है.

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दुनिया भर में पैदा होने वाली अफीम का 80-85 फीसदी हिस्सा यहीं (अफगानिस्तान) पैदा होता है. अफगानिस्तान में पैदा होने वाली अफीम के पीछे मुख्य वजह उसका, तालिबानियों की आय का सबसे बड़ा स्रोत होना भी रहा है. चाहे तालिबानी सत्ता में थे तब या नहीं थे तब भी. अफगानिस्तान अगर दुनिया में अफीम की सबसे ज्यादा पैदावार करने वाला देश माना जाता है तो, वहीं से इसकी दुनिया भर में सबसे ज्यादा तस्करी भी होती है.

अफीम खेती पर समझिए तालिबान का नजरिया

आज के बदले हुए हालातों में अफगानिस्तान के आंतरिक मंत्रालय काउंटर नारकोटिक्स के उप-मंत्री हाजी अब्दुल हक अखोंड हमकर की मानें तो, “आने वाले वक्त में देश में (अफगानिस्तान) अफीम की खेती के संभावित वैधीकरण का विकल्प खुला हुआ है. अगर यह फसल स्थानीय लोगों के लिए (अफगानिस्तानियों को) नुकसानदेह साबित न हो.” मीडिया खबरों के मुताबिक इसकी पुष्टि कंधार में मौजूद वहां के सूचना और संस्कृति निदेशक मावलवी नूर अहमद सईद भी करते हैं. बकौल सईद, “अगर ऐसा संभव है तो इसकी खेती को वैध बनाने पर काम करना सबसे अच्छा होगा. इससे देश की (अफगानिस्तान) अर्थ-व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलना तय है.”

बात जब अफगानिस्तान और अफीम की खेती की हो तो ऐसे में यहां यह भी उल्लेखनीय है कि, दुनिया में अफगानिस्तान ही वो इकलौता देश है जहां उच्च कोटि की हेरोईन की पैदावर और फिर यहीं से उसकी सबसे ज्यादा तस्करी भी होती है. इस सच को भुखमरी के कगार पर आ खड़ी हुई मौजूदा तालिबानी हुकूमत भी समझ चुकी है कि, उसे आर्थिक संकट से उबरने के लिए देश में अफीम और हेरोईन की पैदावार बढ़ानी ही होगी. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से पता चलता है कि, तालिबान की इस सोच की पुष्टि चंद दिन पहले ही यूनाईटेड नेशंस ऑफिस ऑफ ड्रग्स एंड क्राइम (United Nations Office on Drugs and Crime यानी UNODC) भी कर चुका है.

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अफीम कहीं ‘दवाई’ में कहीं ‘कमाई’ में

UNODC के मुताबिक, “तालिबान को अपनी आय के मुख्य स्रोतों में से एक अफीम व्यापार पर सबसे ज्यादा भरोसा है.” ऑस्ट्रेलिया और तुर्की जैसे देश अफीम का इस्तेमाल कानूनी रूप से कई दर्द निवारक दवाईयों को बनाने में भी करते हैं. तालिबानी लोगों के लिए अफीम की खेती और वहां से दुनिया भर में हेरोईन जैसे मादक पदार्थ की तस्करी, मुख्य रूप से अफगानिस्तान के उत्तरी व दक्षिणी हिस्सों में आय का प्रमुख साधन/स्रोत है. हालांकि ऊपर उल्लिखित तमाम सनसनीखेज तथ्यों के बीच यहां एक और भी तथ्य प्रकाश में लाना जरूरी है.

वो तथ्य है कि कुछ ही दिन पहले तालिबान प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने जिक्र किया था कि,”तालिबानी हुकूमत में ड्रग्स के कारोबार को इजाजत नहीं मिलेगी.” उनके उस ऐलान के दो तीन दिन बाद ही अफगानिस्तान में अफीम की कीमतें आसमान छूने लगीं. पता चला कि अफगानिस्तान में उस ऐलान के बाद अफीम की कीमत 70 डॉलर प्रति किलोग्राम से बढ़कर 175 से लेकर 200 डॉलर प्रति किलोग्राम तक जा पहुंचीं. कहा जाता है कि बीते 20 साल के दौरान अमेरिका ने भी अफगानिस्तान में अफीम की खेती करने की कोशिश की थी.

चूंकि उसे तब अफीम और हेरोईन जैस घातक व कीमती ड्रग के मुख्य उत्पादक तालिबानियों का सपोर्ट नहीं था. लिहाजा अफगानिस्तान में अफीम की खेती करने का इरादा अमेरिका ने छोड़ दिया. आइए अब ऐसी अफीम की खेती की बात भारत को ध्यान में रखकर करते हैं. हिंदुस्तान में इसकी खेती के लिए संबंधित किसान को बाकायदा ड्रग लाइसेंस लेना पड़ता है. ड्रग डिपार्टमेंट से मिलने वाले लाइसेंस को हासिल किए बिना अफीम की खेती के लिए उसका एक पौधा लगाना भी गैर-कानूनी है.

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भारत-अफगानिस्तान की अफीम खेती में फर्क

यहां तक की अफीम खेती के कानूनों का उल्लंघन करते पाए जाने पर जेल-जुर्माने दोनों की सजा भी मुकर्रर हो सकती है. इतना ही नहीं अगर अफीम की पैदावार (खेती) के लिए लाइसेंस ले चुका किसान, तय कम से कम निर्धारित वजन की अफीम पैदा नहीं कर सका तो, उसका भी ड्रग लाइसेंस खतरे में पड़ जाता है. मतलब अफीम की खेती का लाइसेंस हासिल कर लेना ही किसान के लिए फतह हासिल कर लेने जैसा नहीं है. उसे अफीम का निर्धारित मात्रा में उत्पादन (पैदावार) करके भी हिंदुस्तानी हुकूमत के हवाले करना होता है.

नारकोटिक्स विभाग के कई ऐसे इंस्टीट्यूट (संस्थान) देश में मौजूद हैं जो अफीम पर अनुसंधान (रिसर्च) करते रहते हैं. यहां से लाइसेंस होल्डर किसान को इस खेती का बीज भी सही दाम पर मिल जाता है. जहां तक हिंदुस्तान में पैदा की जाने वाली अफीमों की नस्लों की बात है तो हमारे यहां सबसे ज्यादा चलन में जवाहर अफीम-16, जवाहर अफीम-539 और जवाहर अफीम-540 जैसी किस्में प्रचलित हैं. प्रति हेक्टेयर खेती के वास्ते एक अनुमान के मुताबिक 7-8 किलो अफीम के बीज की जरूरत होती है. हिंदुस्तानी किसान द्वारा पैदा की गई अफीम सिर्फ और सिर्फ नारकोटिक्स विभाग ही खरीद सकता है.

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