मोस्ट वॉन्टेड अंडरवर्ल्ड डॉन की गिरफ्तारी की बात आखिर 14 दिन तक हिंदुस्तान से क्यों छिपाए रखा दुबई?

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क्राइम की दुनिया का यह सच्चा किस्सा है अब से करीब 19 साल पहले का. तब का जब दुनिया भर में अपने संस्थानों पर एक के बाद एक हो रहे हमलों से अमेरिकी हुकूमत और वहां की तमाम काबिल एजेंसियां हलकान हुई पड़ी थीं. एक हमले के आरोपी हाथ नहीं आ पाते तब तक किसी दूसरे अमेरिकी संस्थान पर हमले की खबर आ जाती. अमेरिकी एजेंसियों के उच्चाधिकारी हिंदुस्तान के चक्कर लगा रहे थे. इस उम्मीद में कि हो न हो भारतीय एजेंसियां उसके बहुत काम आ सकती हैं।

 

हिंदुस्तान में उन दिनों सत्तासीन अटल बिहारी वाजपेयी हुकूमत को लगा कि यही सही मौका है जब अमेरिकियों को तरीके से साधा जा सकता है. अगर अमेरिका भारत के चक्कर लगा रहा था तो भारत भी उन दिनों अपने मोस्ट वॉन्टेड अंडरवर्ल्ड डॉन ऑफताब अंसारी तक पहुंचने के लिए बेताब था।

आफ़ताब अंसारी (Under World Don Aftab Ansari) उन दिनों अंडरवर्ल्ड की दुनिया में भले ही नया नया जम रहा हो. उसकी शुरुआत ने ही मगर हिंदुस्तानी एजेंसियों को हलकान कर डाला था. अगर यह कहा जाए कि आफताब अंसारी के खतरनाक इरादों/ खूनी कारनामों के जाल में फंसी, भारतीय एजेंसियां एक बार को तब अपने मोस्ट वांटेड दाउद इब्राहिम (Dawood Ibhrahim) को तो लगभग भूल ही चुकी थीं।

जिस तरह अमेरिकी एजेंसियां अपने संस्थानों के हमलावरों को तलाशने के लिए धूल फांक रही थीं. उससे कई कदम आगे बढ़कर हिंदुस्तानी एजेंसियां आफताब अंसारी तक पहुंचने के लिए व्याकुल थीं. ऐसे में हिंदुस्तानी एजेंसियों ने भारत आई अमेरिकी एजेंसियों को अधिकारियों को विश्वास में लेने में खुद ही भलाई समझी।

हिंदुस्तान की कूटनीतिक समझदारी

हिंदुस्तानी एजेंसियां जानती थीं कि जब तक अमेरिकी एजेंसियों को भारतीय एजेंसियों से अपना काम निकालने की जरूरत महसूस हो रही है. तभी तक, उनसे (अमेरिकी एजेंसियों) हम (भारतीय एजेंसियां) भी अपना काम आसानी से निकलवा सकते हैं। वरना अपना काम सधते ही अमेरिकी एजेंसियां भारतीय एजेंसियों को आसानी से हाथ नहीं रखने देंगीं. लिहाजा मौके की नजाकत को समझते हुए उन दिनों भारत की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक रहे आईपीएस अधिकारी हिंदुस्तानी हुकूमत के चंद आला-हुक्मरानों से मिले. उन्हें बताया कि अमेरिकी एजेंसियों के कान में डाल दिया जाए कि कोलकता स्थित अमेरिकन सेंटर पर हुए आतंकवादी हमले का मास्टरमाइंड हिंदुस्तानी मोस्ट वांटेड आफताब अंसारी है।

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जैसा सोचा हुआ भी वैसा ही

तो इससे अमेरिकी एजेंसियां आफताब की गिरफ्तारी के लिए खुद ही एकदम हरकत में आ जाएंगी. हुआ भी वही. जैसे ही अमेरिकी एजेंसियों  तक ऑफताब अंसारी का नाम पहुंचाया गया. वे (उन दिनों भारत में ही मौजूद रहे अमेरिकी एजेंसियों के अफसरान) हरकत में आ गए. इसका नतीजा यह हुआ कि सही वक्त पर की गई हिंदुस्तानी हुकूमत की चोट, अमेरिकी एजेंसियों के ऊपर गरम लोहे पर की गई चोट सी साबित हो गई. सीबीआई निदेशक से मुलाकात के तुरंत बाद ही प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उसी शाम अपने प्रमुख सचिव ब्रजेश मिश्र को बुला लिया. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रमुख सचिव से अपनी मंशा जाहिर कर दी, “जैसे भी हो वे (प्रमुख सचिव ब्रजेश मिश्र) भारत में मौजूद अमेरिकी अधिकारियों से तत्काल मिलें. प्रमुख सचिव ने प्रधानमंत्री से कहा कि वे कल (अगले दिन) भारत में मौजूद अमेरिकी अधिकारियों से बात करेंगे.”

प्रधानमंत्री ने काट दी प्रमुख सचिव की दलील

अपने प्रमुख सचिव की बात तत्काल काटते हुए प्रधानमंत्री वाजपेयी बोले, “नहीं कल बहुत देर हो जाएगी. आज रात ही और अभी अमेरिकी अधिकारियों से जाकर मिलो.” ऊपर उल्लिखित इन तमाम सनसनीखेज तथ्यों में से कई की पुष्टि खुद नीरज कुमार करते हैं. दरअसल नीरज कुमार 1976 बैच के पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं. साथ ही वे उन दिनों केंद्रीय जांच ब्यूरो में संयुक्त निदेशक पद पर तैनात भी थे. नीरज कुमार के मशविरे पर ही सीबीआई निदेशक पी.सी. शर्मा प्रधानमंत्री बाजपेई से मिलने गए थे. बहरहाल प्रधानमंत्री के उस आदेश के अमल का सकारात्मक रिजल्ट सामने आ गया. अमेरिकी एजेंसियों (इनमें भारत में मौजूद अमेरिकी राजदूत भी शामिल थे) के हाथों में आफताब अंसारी से संबंधित तमाम खुफिया जानकारियों से भरी फाइल उसी रात पहुंचा दी गई.

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मोस्ट वांटेड की कुंडली अमेरिकी हाथों में पहुंची

पाठकों को जानकर हैरानी होगी कि वो फाइल खुद अमेरिकी राजदूत के हाथों में देकर आने वाले, पूर्व आईपीएस और दिल्ली के रिटायर्ड पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार ही थे. आफताब अंसारी के काले-कारनामों से भरी वो फाइल जब भारत में मौजूद अमेरिकी राजदूत को दी गई, उस रात नई दिल्ली में अमेरिकी एजेंसी एफबीआई चीफ भी मौजूद थे. उन्हीं के सम्मान में आयोजित पार्टी में नीरज कुमार ने आफताब अंसारी की कुंडली (फाइल) अमेरिकी राजदूत के हवाले कर दी. नीरज कुमार से लेकर, अमेरिकी राजदूत ने वो फाइल अपने मातहत एक अधिकारी के हवाले कर दी. उसके बाद हिंदुस्तानी और अमेरिकी एजेंसियों के बीच कोई बात नहीं हुई. हां, अमेरिकी एजेंसियों को उस रात दी गई फाइल के जरिए सीबीआई यह इशारा कर चुकी थी कि, हिंदुस्तान का मोस्ट वांटेड और कोलकता में स्थित अमेरिकन सेंटर पर आतंकवादी हमला कराने का मास्टरमाइंड आफताब अंसारी दुबई में छिपा है.

तुम्हारा बंदा हमने दुबई में धर लिया है

उसके बाद 5 फरवरी 2002 की शाम दुबई में मौजूद भारत के राजदूत के.सी. सिंह ने सीबीआई के संयुक्त निदेशक नीरज कुमार को फोन पर खबर की. के. सी. सिंह के शब्द थे, “तुम्हारा बंदा (आफताब अंसारी) यहां (दुबई) पकड़ा गया है. फटाफट उसे लेने आ जाओ. जरा भी देर करना उचित नहीं होगा.” नीरज कुमार को यह खबर जब मिली उस वक्त वे नई दिल्ली जिले में पार्लियामेंट स्ट्रीट स्थित ज्वाइंट इंटेलीजेंस कमेटी के कार्यालय में चल रही विशेष खुफिया बैठक में हिस्सा ले रहे थे. अगले ही दिन नीरज कुमार दिल्ली पुलिस से हासिल आफताब अंसारी के फिंगर प्रिंट्स इत्यादि से संबंधित फाइल लेकर दुबई में भारतीय राजदूत के.सी. सिंह के सामने मौजूद थे. पता चला कि आफताब अंसारी को तो दुबई में 23 जनवरी 2002 (कोलकता में अमेरिकन सेंटर पर हुए आतंकवादी हमले के अगले ही दिन) को ही गिरफ्तार कर लिया गया था.

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सवाल जिसका जवाब आज भी ‘पहेली’ है

उस वक्त आफताब अंसारी अमीरात की एक उड़ान से पाकिस्तान (इस्लामबाद) भागने की कोशिश में था. हिंदुस्तान के मोस्ट वान्टेड अंडरवर्ल्ड डॉन आफताब को जब दुबई में गिरफ्तार किया गया तब, उसके पास मोहम्मद राणा के नाम से लाहौर (पाकिस्तान) से जारी पासपोर्ट भी मिला था. आफताब अंसारी के उस पाकिस्तानी पासपोर्ट में वही जानकारी दर्ज थी, जो नीरज कुमार द्वारा दिल्ली में अमेरिकी राजदूत ब्लैकबिल को मुहैया कराई थी. यह भी तय है कि आफताब की गिरफ्तारी अमेरिकी एजेंसियों को बीच में और वक्त रहते ले लेने का ही नतीजा थी. हां, एक सवाल यह 18-19 साल बाद भी सीबीआई की नजर में अबूझ पहेली ही बना हुआ है कि, आखिर जब दुबई में आफताब अंसारी को 23 जनवरी को ही गिरफ्तार कर लिया गया था. तो फिर दुबई की हुकूमत उसकी गिरफ्तारी की बात हिंदुस्तानी एजेंसियों से आखिर 14 दिन तक (5 फरवरी 2002) आखिर छिपाए क्यों रही?

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