जम्मू-कश्मीर: कश्मीरी पंडितों के जख्म पर मरहम, विस्थापितों की संपत्ति वापस मिलने का रास्ता साफ

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कश्मीर घाटी में हिंसा के कारण मजबूर होकर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडित सहित सभी विस्थापितों की पुश्तैनी जायदाद वापस दिलाने के एक कदम के तौर पर इससे जुड़ी शिकायतों की सुनवाई के लिए जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने पहल करते हुए ऑनलाइन पोर्टल लॉन्च किया है।

इस पोर्टल पर वे कश्मीरी, जिनकी संपत्तियों पर कब्जे हुए हैं या जिन्हें मजबूर करके सम्पत्तियां खरीदी गईं हैं, अपनी शिकायतें दर्ज करा सकेंगे।

 

निजी-सार्वजनिक संपत्तियों की शिकायतें दर्ज होंगी
इस पोर्टल पर देश-विदेश में कहीं भी रहने वाले विस्थापित कश्मीरी अपनी व्यक्तिगत या सार्वजनिक जायदाद के कब्जे या उन्हें कम दामों में खरीदे जाने की शिकायत दर्ज करा सकेंगे। शिकायत दर्ज कराने के बाद उनको एक यूनिक आईडी मिल जाएगा। इसके बाद यह आवेदन संबंधित जिले में भेजकर कार्रवाई कराई जाएगी और समय-समय पर शिकायतकर्ता या पीड़ित पक्ष को इसकी जानकारी दी जाएगी। इन शिकायतों की जांच के बाद एक तय सीमा में सरकार शिकायतकर्ता की जायदाद वापस कराएगी। इस पोर्टल की मदद से कश्मीरी विस्थापितों के रिकॉर्ड को ठीक करवाने, हदबंदी करने, अतिक्रमण हटाने के लिए आवेदन करने की सुविधा मिल सकेगी। पब्लिक सर्विस गारंटी ऐक्ट के तहत आवेदन करने वालों का निपटारा भी निर्धारित समय के अंदर होगा। इससे लोगों को शिकायत करने के लिए इधर-उधर चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

 

इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं
इस संबंध में किसी जानकारी के लिए राहत और पुनर्वास आयुक्त कार्यालय 0191-2586218 और 0191-2585458 पर संपर्क कर सकते हैं। मिलने वाली शिकायतों की जांच 15 दिन के अंदर जिलाधिकारी करेंगे और मौके का मुआयना करेंगे। इसके बाद शिकायत को लेकर जो भी रिपोर्ट होगी वो कश्मीर के डिवीजनल कमिश्नर को दी जाएगी। शिकायत पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी।

कानून बने पर अनुपालन नहीं हुआ
इस मुद्दे को हल करने के लिए, 2 जून 1997 को ‘जम्मू-कश्मीर प्रवासी अचल संपत्ति (संरक्षण, संरक्षण और संकट बिक्री पर संयम) अधिनियम- 1997’ नामक एक अधिनियम पारित किया गया था। इस अधिनियम ने प्रवासियों की अचल संपत्ति की संकटकालीन बिक्री पर संरक्षण, सुरक्षा और संयम प्रदान किया। इस अधिनियम के तहत, संबंधित जिला मजिस्ट्रेट को प्रवासी संपत्तियों के संरक्षक के रूप में नामित किया गया था। अधिनियम संकटकालीन बिक्री, अचल संपत्ति की अभिरक्षा, अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली, सक्षम प्राधिकारी द्वारा कार्यान्वयन आदि को रोकने के लिए कुछ प्रतिबंधों का प्रावधान करता है। लेकिन इस अधिनियम का अनुपालन सुनिश्चित नही हो पाया। विभिन्न प्रावधानों के बावजूद, विभिन्न माध्यमों से संकटकालीन बिक्री और अलगाव के कई उदाहरण सामने आए हैं।

 

 

 

लगभग 60 हजार परिवारों का पलायन हुआ
घाटी में भयानक हिंसा और उथल-पुथल के दौरान 90 के दशक में लगभग 60 हजार परिवार घाटी से पलायन कर गए थे, जिनमें से लगभग 44 हजार विस्थापित परिवार ‘राहत संगठन, जम्मू-कश्मीर’ में पंजीकृत हैं। जबकि, बाकी परिवारों ने अन्य राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में स्थानांतरित होने का विकल्प चुना। गौरतलब है कि वर्ष 1989-1990 में जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की शुरुआत के साथ बड़ी संख्या में लोगों को अपने पैतृक निवास स्थान से पलायन करना पड़ा, विशेष रूप से कश्मीर डिवीजन में।

कश्मीरी हिंदुओं के साथ-साथ कई सिख और मुस्लिम परिवारों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। इन विस्थापितों की अचल संपत्तियों पर या तो अतिक्रमण कर लिया गया या उन्हें अपनी संपत्ति को औने-पौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर किया गया।

पीड़ितों की दुर्दशा का अंत होगा : सिन्हा
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा कि यह पहल उन विस्थापितों की दुर्दशा का अंत करेगी जो 1990 के दशक से पीड़ित हैं। हिंसा ने सभी को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि राहत संगठन में पंजीकृत 44,000 विस्थापित परिवारों में से 40,142 हिंदू परिवार हैं, 2684 मुस्लिम परिवार हैं और 1730 सिख समुदाय से हैं।

उन्होंने बताया कि पोर्टल के ट्रायल रन अवधि के दौरान, हमें 854 शिकायतें मिली हैं। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि बड़ी संख्या में विस्थापित परिवार न्याय की प्रतीक्षा कर रहे थे। अब, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई से व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास बहाल होगा।

उपराज्यपाल ने कहा कि विभिन्न धर्मों के कई प्रतिनिधिमंडलों ने विस्थापितों की वापसी का समर्थन किया है। अतीत की गलतियों को सुधारना वर्तमान की जिम्मेदारी है। यह पुराने घावों को भरने का समय है। उन्होंने कहा ‘मुझे उम्मीद है कि हजारों परिवार न्याय और अपनी गरिमा फिर से हासिल करेंगे।

’ उपराज्यपाल ने कहा, ‘पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आदर्शों का पालन करते हुए हम जम्मू-कश्मीर में सामाजिक समानता और सद्भाव के लिए व्यापक और रचनात्मक कार्यक्रमों को लागू करने का प्रयास कर रहे हैं।

 

 

 

 

 

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