खुलने लगीं किसान आंदोलन की परतें, क्यों बार-बार हरियाणा सरकार के मंत्रियों का किया जा रहा घेराव?

Advertisements

पंचकूला। Kisan Andolan एक बहुत ही सामान्य सा सवाल है कि जब तीन कृषि कानूनों में किसी भी तरह का बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है तो फिर आंदोलन की धुरी हरियाणा क्यों बना हुआ है? क्यों बार-बार हरियाणा सरकार के मंत्रियों-नेताओं का घेराव किया जा रहा? क्यों सरकारी कामकाज में दखल पैदा करते हुए प्रशासनिक सिस्टम को चलने नहीं दिया जा रहा? इन सवालों के जवाब किसान नेताओं के पास अलग हैं तो कांग्रेस नेताओं के पास अलग।

 

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर आंदोलनकारियों को भड़काने, उनका राजनीतिक दोहन करने और किसानों को केंद्र के साथ बिना शर्त वार्ता के लिए नहीं जाने देने के खुले आरोप मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने लगाए। इसी तरह के आरोप उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के भी हैं। आंदोलनकारियों पर करीब 1,200 करोड़ रुपये का चंदा तक इकट्ठा करने के आरोप लगे।

इसे भी पढ़ें-  Kerala Weather Updates: केरल में भारी बारिश और भूस्खलन से तबाही, अब तक 9 लोगों की मौत, रेस्क्यू आपरेशन जारी

 

भाजपा और जननायक जनता पार्टी की सरकार के मंत्री आंदोलनकारियों के मंसूबों पर अलग ही सवाल उठा रहे हैं। बात-बात में हरियाणा को छोटा भाई कहकर अक्सर दबाने वाले बड़े भाई पंजाब के मंसूबे भी इस आंदोलन को लेकर ठीक नहीं हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच पिछले दिनों जब किसानों के मुद्दे पर जमकर बहस हुई तो कई ऐसी बातें उभरकर सामने आईं, जिनके आधार पर इस पूरे आंदोलन को यदि कांग्रेस जनित भी कह दिया जाए तो कोई हर्ज नहीं होगा।

 

हरियाणा सरकार के कृषि मंत्री जेपी दलाल तो भाकियू नेता गुरनाम सिंह चढूनी को भूपेंद्र सिंह हुड्डा का पेड वर्कर (पैसे लेकर काम करने वाला) तक कह चुके हैं। भाकियू नेता राकेश टिकैत की स्थिति तो बिल्कुल ऐसी है, जैसी जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले यशपाल मलिक की थी, जो उत्तर प्रदेश से यहां आकर आंदोलन का झंडा बुलंद करते थे।

इसे भी पढ़ें-  कटनी के माधवनगर में सिर में पत्थर पटक कर युवक की हत्या

 

योगेंद्र यादव और कामरेड इंद्रजीत की छवि आंदोलन में कम्युनिस्ट विचारधारा को हवा देने वाली है तो पंजाब के किसान नेता राजेवाल का गन्ने का रेट बढ़ने पर कैप्टन अमरिंदर सिंह को लड्डू खिलाते हुए फोटो वायरल होता है तो कहानी खुद ब खुद समझ में आने लगती है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल बार-बार कह चुके हैं कि तीन कृषि कानून रद करने की जिद छोड़कर किसान नेता केंद्र सरकार से बात करें, लेकिन उनकी एक ही रट है कि पहले इन तीन कृषि कानूनों को रद किया जाए।

भला कानून ही रद करने हैं तो फिर बातचीत किस बात की? केंद्र सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि हर कानून में बदलाव संभव हैं, लेकिन किसान नेता बातचीत के दौरान कम से कम यह तो समझाएं कि आखिर इन कानूनों में कमियां क्या हैं? न मंडियां बंद हो रहीं और न ही एमएसपी खत्म किया जा रहा। किसानों को अपनी फसल कहीं भी बेचने की आजादी दी जा रही तो फिर डर किस बात का?

इसे भी पढ़ें-  शिया मुसलमानों का जानी दुश्मन बना ISIS, खुलेआम चेताया- जहां भी रहोगे, हम तुम्हें मार देंगे

हरियाणा के मुख्यमंत्री के इन सवालों का पंजाब की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया, लेकिन बदले में मुजफ्फरनगर पंचायत के बाद करनाल में महा पंचायत जरूर मिली। करनाल के तत्कालीन एसडीएम आयुष सिन्हा का

आंदोलनकारियों का सिर फोड़ देने वाला वीडियो नि:संदेह प्रशासनिक मशीनरी के कामकाज के एथिक्स के खिलाफ है और सरकार ने तबादले के रूप में उसकी सजा भी दे दी है, लेकिन केंद्र से बात किए बिना हरियाणा को लंबे समय तक आंदोलन स्थली बनाए रखने का औचित्य समझ से परे है।

 

Advertisements