संकट के सिपाही : ……फिर भी फर्ज से नहीं डिगे 

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कोरोना संकट से एक बार उबार लेने वाले योद्धा अब दूसरी बार खतरनाक हो रहे वायरस को हराने में जुटे हैं। अपनी पीड़ा की परवाह किये बिना अपना फर्ज निभाने की खातिर ये दिन-रात एक किये हुए हैं। कई चिकित्सक और मेडिकल स्टाफ अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर बीमारों की सेवा में दिन-रात लगे हुए हैं।

ये दवा के साथ ढांढस भी दे रहे हैं ताकि मरीज हिम्मत न हारें। संकट के इस भयावह दौर में खुद की जान खतरे में डालकर इंसानियत की मिसाल बनने वाले ये हैं असली हीरो…

डॉ. प्रदीप नेगी, लाहौल-स्पीति : दुर्गम रास्तों पर चलकर 3 हजार से अधिक सैंपल ले चुके हैं अब तक
लाहौल-स्पीति यानी हिमाचल का सबसे दुर्गम क्षेत्र। माइनस 15 डिग्री तक हाड़ कंपा देने वाली ठंड और सूचना मिलने पर डॉ. प्रदीप नेगी तुरंत सैंपल लेने के लिए रवाना हो जाते हैं। चाहे मौसम साफ हो या बर्फ पड़ रही हो। डॉ. प्रदीप अब तक घाटी में 3000 से अधिक कोरोना के सैंपल ले चुके हैं। खराब मौसम में अक्सर सैंपल लेने उन्हें पैदल जाना पड़ता है।

उन्होंने सलग्रां और कुरचेड़ जैसे दुर्गम गांव में पहुंच कर कोविड टेस्ट लिए हैं। पिछले दिनों वे बर्फबारी के बीच केलांग से आठ किमी पैदल चलकर कारगा पहुंचे और सैंपल लेकर वापस अस्पताल पहुंचे। एक बार बर्फबारी के बीच कोविड टेस्ट लेने जाते समय थिरोट के समीप बर्फ में इनकी एंबुलेंस भी फिसल गई थी। इस घटना में डॉक्टर नेगी बाल-बाल बचे। इसके बावजूद उनका कोविड टेस्ट अभियान जारी है।

मूलतया किनौर के भावावैली निवासी डॉ. नेगी को लाहौल में सेवाएं देते हुए तीन साल हो गए हैं। यहां डॉक्टर ट्रांसफर होने की सूचना मिलते ही अपना तबादला कहीं और करवा लेते हैं।  जिला कोविड निगरानी अधिकारी डॉ. रंजीत वैद्य ने बताया कि डॉक्टर नेगी 365 दिनों में केवल 12 दिन अवकाश पर गए। इस दौरान घर में कई बार परिवार के सदस्य बीमार भी पड़े, लेकिन डॉ. नेगी कोविड के खिलाफ जंग में डटे रहे। आजकल जब हालात थोड़े सामान्य हैं नेगी को लाहौल घाटी आने वाले कामगारों के कोविड टेस्ट लेने के लिए मनाली में तैनात कर रखा है। जहां वे रोजाना 100 कामगारों के टेस्ट लेते हैं। उन्हें स्वास्थ्य विभाग बेहतरीन सेवाओं के लिए सम्मानित भी कर चुका है।

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डॉ. पृथ्वी और डॉ, कुसुम, हमीरपुर : तीन साल की बेटी से दूर डॉक्टर दंपती निभा रहा फर्ज
कोरोना महामारी के शुरुआती दौर में जब लोग इसके नाम से घबरा रहे थे तब स्वास्थ्य खंड भोरंज के डॉ. पृथ्वी बढ़-चढ़कर सैंपलिंग कर रहे थे। वहीं, उनकी पत्नी डॉ. कुसुम दियोटसिद्ध आइसोलेशन केंद्र की प्रभारी रहकर लोगों को उचित इलाज और परामर्श दे रही थीं।

अपनी तीन साल की बेटी को उसके ननिहाल में छोड़कर इस डॉक्टर दंपती ने कोरोना के खिलाफ लड़ाई लड़ी और फर्ज की खातिर महीनों अपने जिगर के टुकड़े से दूर रहे। उधर, बीएमओ भोरंज डॉ. ललित कालिया ने एक साल से बिना छुट्टी लिए दिन-रात अपना फर्ज निभाया है।

 

जरूरतमंदों के लिए सहारा बनीं शिमला की गांधो देवी
शिमला शहर के आंगनबाड़ी केंद्र नाभा में तैनात 52 साल की गांधो देवी ने महामारी में लॉकडाउन के दौरान करीब 500 कोरोना मरीजों तक मदद पहुंचाकर कोरोना योद्धा की मिसाल पेश की है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने कभी ड्यूटी देने से इनकार नहीं किया। दिन-रात लोगों की सेवा की। टूटीकड़ी निवासी गांधो देवी 33 साल से महिला बाल विकास विभाग के अंतर्गत आंगनबाड़ी केंद्र में वर्कर के तौर पर सेवाएं दे रही हैं। गांधो देवी ने बताया कि कोविड काल के शुरुआती दौर में क्षेत्र में बाहरी राज्य से आए लोगों को क्वारंटीन करने की ड्यूटी लगी है।

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इसी बीच उन्होंने कोरोना संक्रमित, होम क्वारंटीन मरीजों को खाद्य सामग्री से लेकर दवाइयां घरों तक उपलब्ध करवाने का कार्य बखूबी पूरा किया। क्षेत्र में अकेले रह रहे बुजुर्गों के लिए भी गांधो देवी सहारा बनीं। लॉकडाउन के दौरान सुबह सात बजे से लेकर रात आठ बजे तक दूध, सब्जियों सहित खाद्य सामग्री जरूरतमंद और गरीबों को मुहैया करवाई। गांधो देवी महिला दिवस और हिमाचल दिवस पर भी इस नेक कार्य के लिए कोरोना योद्धा के तौर पर सम्मानित हो चुकी हैं।

डॉ. अली अंसारी, जम्मू : शवों को घर तक पहुंचाया, आर्थिक मदद भी पहुंचाई
इन्हीं वारियर्स में से एक शहर के प्रमुख जच्चा बच्चा अस्पताल एसएमजीएस के इमरजेंसी स्टाफ के सदस्य अली अंसारी हैं। अली अंसारी बताते हैं कि वे कोविड मरीजों और शवों को पहुंचाने के साथ अन्य सामान्य चिकित्सा सुविधाओं में अपना योगदान दे रहे हैं। पिछले साल कोविड के चलते वे चार माह घर नहीं जा सके थे और अस्पताल में रहकर मरीजों की सेवा में जुटे रहे। इस दौरान सैकड़ों मरीजों को शिफ्ट किया गया। काजीगुंड निवासी एक कोविड संक्रमित महिला के शव को गुज्जर नगर जम्मू में दफनाने के लिए अपना सहयोग दिया। उस समय मृतक महिला के साथ सिर्फ एक सदस्य ही था, तब उसके परिवारवालों को आर्थिक मदद भी मुहैया करवाई। अंसारी कहते हैं कि इस बार पिछली बार की तुलना में कोविड संक्रमण का तेजी से प्रसार हो रहा है, जिससे चुनौतियां भी बढ़ी हैं। एसएमजीएस में ही रोजाना कई मरीज कोविड संक्रमित निकल रहे हैं। इसके लिए सबको कोविड प्रोटोकाल का सख्ती से पालन करके पूरे एहतियात बरतने चाहिए।

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डॉ जियाउल हक, जौनपुर: खुद संक्रमित हुए, फिर भी ड्यूटी पर डटे रहे
जिला अस्पताल के महामारी रोग विशेषज्ञ डॉ. जियाउल हक की ड्यूटी कोरोना मरीजों की निगरानी में लगी है। रोजाना कितने मरीज मिल रहे हैं, वह कहां हैं, उनकी स्थिति क्या है, इसका जिम्मा वह पिछले वर्ष जनवरी से ही संभाल रहे हैं। लॉकडाउन के बाद कोरोना का संक्रमण तेज हुआ, तब भी वह अपनी ड्यूटी में लगे रहे। उन्हें परिवार से भी दूर रहना पड़ा। एक-एक मरीज की जानकारी जुटाकर संबंधित चिकित्सक व स्वास्थ्य केंद्र को अवगत कराना, उनकी दैनिक स्थिति की जानकारी लेना और सलाह देना, उनके कार्य का हिस्सा रहा। इस बीच वह खुद भी कोरोना संक्रमित हुए, मगर ठीक होते ही फिर ड्यूटी पर डट गए। दूसरी लहर में भी निगरानी का जिम्मा वह बखूबी संभाल रहे हैं।

मूल रूप से बिहार के रहने वाले डॉ. जियाउल ने बताया कि पहली लहर के दौरान जब ड्यूटी पर थे तो खतरे को भांपते हुए परिवार को गांव भेज दिया था, ताकि उनकी ड्यूटी पर कोई असर न हो और परिवार भी सुरक्षित रहे।

 

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