पिछले साल के लॉकडाउन के नहीं भरे जख्म : राजस्थान के परिवारों ने कहा अब लॉकडाउन लगा तो मर जी जाएंगे

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  • बरेला में पहाड़ी पर रहकर कर रहे भेंड पालन, परिवार का पेट भरने के लिए कर रहे मजदूरी

जबलपुर । कोरोनाकाल की मार ने इस बार पिछले साल मार्च में लगे लॉकडाउन के जख्म फिर ताजा कर दिए। जिसका एक उदाहरण जबलपुर के बरेला में देखने मिला। रविवार के लगे लॉकडाउन के बीच राजस्थानी लिबास में दर्जनों भेड़ों और बकरियों को चराने जा रही महिलाओं को देखकर, गुजर रहे पुलिस कर्मी भी ठिठक गए।

महिलाओं ने बताया कि वह मूल राजस्थान की निवासी है। हंसता-खेलता परिवार था, लेकिन पिछले साल लगे लॉकडाउन में जब दो जून की रोटी का जुगाड़ करना भी परिवार के लिए पहाड़ जितना भारी हो गया तो थकहार कर पुस्तैनी जमीन का सौदा कर दिया और फिर लोकलाज के डर से अपनी मातृभूमि को छोड़कर मध्यप्रदेश के बरेला आ गए और फिर यहीं बसेरा कर लिया। अपनी आपबीती बयां करते हुए लोसनराम की आंखों में मजबूरी और असहाय हालातों में पीड़ा की दर्दनाक झलक साफ देखी जा सकती है, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।

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जब परिजनों का भार उठाना हुआ मुश्किल
घर के परिजनों के साथ भेड़ चराने जा रहे युवक लोसनराम ने बताया कि पिछले साल जब पूरे देश में लॉकडाउन लग गया था, उस समय उनका परिवार राजस्थान, जैसलमेर गांव में दो जून की रोटी के लिए मोहताज हो गया। रोजी छूट गयी तो पूरा परिवार सहम गया। जिसके बाद मां-पिताजी ने थोड़ी सी बची पुस्तैनी जमीन गिरवी रख दी, लेकिन जब उतने पैसों से भी काम नहीं चला तो जमीन साहूकार को बेंचनी पड़ी और परिवार रोड पर आ गया।

मजदूरी करने जा रहे थे मुम्बई
युवक ने बताया कि उनका पूरा परिवार लॉकडाउन के बाद मुम्बई जा रहा था, लेकिन उनके रिश्तेदार जो मध्यप्रदेश के मंडला में थे, उन्होंने भेड पालन कर यहीं बसने का सुझाव दिया। सो पूरा परिवार जबलपुर के बरेला आ गया और यहां बंड़ा उमरिया में पहाड़ी पर भेड और बकरियों के साथ जीवन गुजार रहा है। तो वहीं घर के पुरुष लकड़ी काटना, खेतों में मजदूरी करके दो निवालों का कैसे भी जुगाड़ कर लेते है।

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तो अब कहां जाएंगे साहब….
रविवार को जब कोरोना के बढ़ते प्रकोप के चलते लॉकडाउन लग गया तो पूरा परिवार फिर सहम गया। उनका कहना था कि यदि उन्हें घर से बाहर नहीं निकलने दिया गया तो उनकी भेड़ और बकरी मर जाएंगी। उन्हें चराने तो बाहर निकलना ही पड़ेगा। उन्होंने बताया कि सरकार ने उनकी कोई मदद नहीं की, उल्टे यदि सरकार के बल पर रहते दो अब तक भूखे मर गए होते।

दांस्ता सुन आंखे हुई नम
अपने घर और परिवार के लिए, इस बेतहासा बढ़ती महंगाई में भी संघर्ष का रास्त चुन, भेड़-बकरी पालकर दो निवालों का जुगाड़ करने जब आज बरेला हाइवे क्रमांक-12 पर उनको देखा तो कुछ पुलिस कर्मचारियों ने उन्हें रोककर पूछताछ की। लेकिन जब उन्होंने बताया कि वह भेड़ों को चराने जा रहे है, इन्हें बेंचने या तस्करी करने नहीं। जब कर्मियों ने लॉकडाउन का हवाला देकर रोका तो उन्होंने अपनी पूरी कहानी बयां कर दी। जिसके बाद कर्मियों की अांखें भी नम हो गयीं और उन्हें नहीं रोका।

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