कुछ दिन में खत्म हो जाएगा कोरोना? प्रख्यात वायरोलॉजिस्ट से जनिये जवाब

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वेब डेस्क। कोरोना वायरस महामारी के सामने आने के बाद से ही प्रख्यात वायरोलॉजिस्ट और क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर के पूर्व प्रोफेसर डॉक्टर टी जैकब जॉन इस विषय पर लगातार अपना मत रखते आ रहे हैं. इंडिया टुडे को दिए गए एक इंटरव्यू में डॉ. जैकब ने बताया कि कोरोना वायरस अब खात्मे की ओर है और एक से दो महीने में स्थिति सामान्य होगी.

उन्होंने कहा कि कोरोना के नए स्ट्रेन की बात सच है और हमें कोरोना के पहले स्ट्रेन के बारे में काफी कुछ पता लगाना होगा जिससे कोरोना के अन्य स्ट्रेन से जंग लड़ी जा सके. कोवैक्सीन को लेकर उन्होंने कहा कि इसे बनाने का तरीका अभूतपूर्व है लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह इस समय भी अभूतपूर्व है.

कोवैक्सीन को आपात स्थिति में इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई है लेकिन सरकार इस वैक्सीन को खरीदने के लिए बाध्य नहीं है. कोवैक्सीन विवाद पर उन्होंने कहा कि ” मेरी व्यक्तिगत राय पूछेंगे तो मैं कोविशील्ड के बजाए कोवैक्सीन का चुनाव करूंगा.”

यहां पढ़िए उनके साक्षात्कार के मुख्य अंश…

सवाल: भारत बायोटेक के वैक्सीन को लेकर काफी विवाद हुआ है. इसके इस्तेमाल की अनुमति और इसके जुड़े विवाद के बारे में आप क्या सोचते हैं?

जवाब: कई जानकार इस वैक्सीन को लेकर संशय में हैं और यह समझा भी जा सकता है. ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने इस वैक्सीन को लेकर रिस्ट्रिक्डेट, इमरजेंसी और इन ट्रायल मोड जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया. अगर कोई शांति से सोचे तो यह स्पष्ट है कि स्वास्थ्य मंत्रालय कोविडशील्ड को आराम से इस्तेमाल की इजाजत देने की तैयारी में है जबकि कोवैक्सीन को आपात इस्तेमाल की ही अनुमति है. हालांकि जिम्मेदारी कंपनी के ऊपर ही है. वैक्सीनेशन से पहले सहमति पत्र और अंडर फेज थ्री ट्रायल की बात जाहिर की जानी जरूरी हैं.

वैक्सीन बनाने का तरीका अभूतपूर्व है. हालांकि हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह संकट भी अभूतपूर्व है. वैक्सीन के आपात इस्तेमाल की अनुमति दी गई है लेकिन भारत सरकार इसे खरीदने के लिए बाध्य नहीं है.इसमें काफी बड़ा अंतर है लेकिन अगर हम इसे विवाद का नाम दें तो यहां पीड़ित पक्ष कौन है?

सवाल: आलोचकों ने कोवैक्सीन को दी आपात इस्तेमाल की अनुमति को लेकर सवाल उठाए हैं. किसी वैक्सीन के प्रभाव के बारे में जाने बिना आपात इस्तेमाल की अनुमति क्यों दी गई?

जवाब: अगर वैक्सीन के प्रभाव का आंकड़ा उपलब्ध है और यह 50 प्रतिशत से ज्यादा प्रभावी है तो फिर यह स्वंय ही रजिस्ट्रेशन के योग्य है. अगर इसके प्रभाव के आंकड़े मांगे गए तो ट्रायल कोड को तोड़ना ही होता. यह डाटा एंड सेफ्टी मॉनिटरिंग बोर्ड के नियमों के तहत जाहिर है.

आपात इस्तेमाल की अनुमति ही इस बात पर निर्भर करती है कि वैक्सीन पूरी तरह से सुरक्षित है और यह फेज 2 के ट्रायल में स्पष्ट था. डीजीसीआई दोनों ही स्थितियों पर सहमत था. वैक्सीन काफी रिएक्टोजेनिक नहीं थी. एक जानकार ने इसे पानी की तरह नॉन रिएक्टोजेनिक कहा था.

मैं समझता हूं कि 24000 लोगों ने इस वैक्सीन के ट्रायल में भाग लिया था. वैक्सीन सुरक्षा मानकों पर खरी उतरी थी. अगर भोपाल में हुई मौत का संबंध वैक्सीन से नहीं है. ऐसे लगता भी है कि यह मौत वैक्सीन की वजह से नहीं हुई तो डीसीजीआई को वैक्सीन के कोड पर सवाल नहीं उठाना चाहिए. अगर एक बार कंपनी ने वैक्सीन के लिए अप्लाई कर दिया है तो फिर डीजीसीआई के पास इनकार करने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए.

सवाल: प्रोफेसर गगनदीप कंग का कहना है कि इबोला और निपाह वैक्सीन के इस्तेमाल की अनुमति तीसरे फेज का ट्रायल पूरा किए बिना ही दे दी गई थी. कोरोना के लिए यह अप्लाई नहीं होता है क्योंकि कोरोना के मामलों में मृत्यु दर इन वायरस के मामलों से अलग है और हमारे पास अन्य कंपनियों की वैक्सीन उपलब्ध हैं. क्या वो सही कह रही हैं?

जवाब: मैं निपाह के लिए बनी किसी भी वैक्सीन से अनजान हूं. मुझे गगनदीप कंग पर संदेह करना चाहिए ऐसा लगता है कि वो मेरे (धन्य धर्मपालन) के लिखे गए अक्टूबर 24, 2020 के पेपर इंडियान जे ऑफ मेडिकल एथिक्स, को कोट कर रही थीं. मैंने कहा था कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है. इबोला वायरस को लेकर बनाई गई एक वैक्सीन को बिना तीसरे फेज के ट्रायल के ही गुआना में साल 2015 में इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई थी.

यहां इबोला से 40 प्रतिशत लोगों की मौत हो रही थी. लोग चाहते थे कि जल्द से जल्द वैक्सीन को अनुमति दी जाए. सभी इबोला संक्रमित लोगों के बारे में जानकारी जुटाई गई और इबोला पीड़ित लोगों के संपर्क में आए लोगों को 21 दिन बाद वैक्सीन दी गई. जिन्हें पहले वैक्सीन दी गई उन लोगों में इबोला की लक्षण नहीं देखे गए लेकिन बाद में वैक्सीनेट किए गए कई लोगों में इबोला के लक्षण देखे गए थे.

रिजल्ट आने के बाद वैक्सीन को प्रभावी घोषित कर दिया गया था. कोरोना और इबोला में फर्क है. कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या इबोला की तुलना में कम है. कोरोना का संक्रमण दर 0.68 प्रतिशत रहा है. यह आंकड़ा अन्य देशों में अलग हो सकता है. लोगों को मौत से ही बचाना अंतिम ध्येय नहीं था. पहले से ही गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों को भी वायरस के प्रति मजबूत बनाने की भी जिम्मेदारी थी. वैक्सीन लोगों पर प्रभावी असर कर रही है और लोगों में इम्यूनिटी बढ़ी हुई देखी गई है.

सवाल: प्रख्यात सरकारी डॉक्टर बलराम भार्गव और विनोद पॉल का कहना है कि कोवैक्सीन को इसलिए इस्तेमाल की इजाजत दी गई क्योंकि इसमें कोरोना के नए स्ट्रेन से भी लड़ने की क्षमता है, बिना किसी डाटा के ऐसे दावे को आप कैसे देखते हैं?

जवाब: जहां तक मुझे जानकारी है अबतक कोरोना का एक ही स्ट्रेन SARS-CoV-2 सामने आया है. मुझे संशय है कि आप शायद ही विनोद पॉल को सही तरह से कोट कर रहे हैं. आपात इस्तेमाल के लिए दिए जाने वाले तथ्य बाहरी लोगों को शायद ही पता होते हैं. शायद डॉ. भार्गव या डॉ. विनोद पॉल ने EUA की तरफ से दो वैक्सीन को दिए गए आपात इस्तेमाल की अनुमति पर कमेंट करते हुए कहा हो कि वायरस के लिए एक से अच्छी दो वैक्सीन है.या फिर वायरस को पूरी तरह से निष्क्रिय करने और व्यापक इम्यून रिस्पांस के बारे में उन्होंने कहा हो जैसा कि कोविशील्ड सिर्फ प्रोटीन स्पाइक में सहायक है.

सवाल: कोवैक्सीन क्लीनिकल ट्रायल मोड में ही इस्तेमाल के लिए अनुमति हासिल कर चुकी है. इसका क्या मतलब है? क्या इससे ऐसा नहीं लगता कि मौजूदा समय में जिन लोगों को वैक्सीन दी जाएगी वो लोग ट्रायल का हिस्सा बनकर ही रह जाएंगे?

जवाब: फिलहाल जो वैक्सीनेशन हो रहा है वो ट्रायल से अलग. ट्रायल मोड में वैक्सीनेशन से जुड़ी जानकारियां जुटाई जाती हैं. कंपनी क्लीनिकल कॉन्टैक्ट्स के जरिए जानकारी जुटाती है और ट्रायल में हिस्सा लेने वालों से पहले सहमति ली जाती है. अंग्रेजी में शब्दों का अर्थ अलग-अलग होता है. ट्रायल के लिए अस्पष्टता और शुद्धता दोनों शब्दों का इस्तेमाल हो सकता है. यहां ट्रायल का मेरे लिए मतलब शुद्धता से है.

 

सवाल: क्या लाभार्थी को कोवैक्सीन और कोविशील्ड के बीच चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए?

जवाब: जब ईयूए ने दो वैक्सीन को मंजूरी दी है तो बिल्कुल ऐसा होना चाहिए. लेकिन यहां दोनों वैक्सीन्स को अलग-अलग तरीकों से मंजूरी दी गई है. सरकार कोविशील्ड को लेकर आएगी और कंपनी कोवैक्सीन को. ऐसे में लाभार्थियों के पास विकल्प नहीं बचता है.

सवाल: कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने पूछा है कि क्या भारत बायोटेक की वैक्सीन मानव समाज के लिए सुरक्षित है? क्या सरकार इसकी गारंटी दे सकती है? क्या आपको लगता है कि सरकार को वैक्सीन के प्रभाव और सुरक्षा को लेकर गारंटी देनी चाहिए?

जवाब: मुझे लगता है कि, राजनीतिक पार्टियों का इस मामले में हस्तक्षेप उचित नहीं है. डीसीजीआई एक स्वतंत्र संस्था है. डीजीसीआई ने वैक्सीन के इस्तेमाल की अनुमति दी है केंद्र सरकार ने नहीं. वैक्सीन के प्रभावी होने के आंकड़े पूरे नहीं हुए हैं और वैक्सीन के आपात इस्तेमाल की अनुमति दी गई है, रजिस्ट्रेशन की नहीं. डीजीसीआई ने ऐसा किया है तो कुछ वाजिब कारणों से ही किया होगा. इसमें सुरक्षा और वैक्सीन का प्रभावी होना दोनों शामिल होगा. मुझे नहीं लगता कि सरकार के पास किसी चीज की गारंटी देने की ताकत है.डीजीसीआई ने आपात इस्तेमाल की अनुमति दी है और सरकार का मार्गदर्शन किया है. आपात इस्तेमाल के लिए सुरक्षा मानक की जरूरत होती है सटीक प्रभावी होने की नहीं.

सवाल: सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक दोनों ने ही वैक्सीनेशन के बाद साइड इफेक्ट के मामले में क्षतिपूर्ति की अपील की है, क्या ऐसा किया जाना चाहिए?

जवाब: काश, मैं स्वास्थ्य सेवाओं, वायरोलॉजी के इतर थोड़ा कानून के बारे में भी पढ़ पाता. मैं इस सवाल का जवाब देने में सक्षम नहीं हूं आप किसी अच्छे कानून के जानकार से इस सवाल का जवाब पूछ सकते हैं.

सवाल: क्या आपका लगता है कि ऐसी बातें वैक्सीनेशन में शामिल हो रहे लोगों के मन में संशय पैदा करेंगी?

जवाब: मैं इस सवाल का जवाब देने में सक्षम नहीं हूं.वैक्सीन लाभार्थी पर इसके प्रभाव दोनों के निहितार्थ से अच्छी तरह वाकिफ नहीं हूं.

सवाल: अगर आप को कोवैक्सीन और कोविशील्ड के बीच चुनने का विकल्प दिया जाए तो आप किसे चुनेंगे और क्यों?

जवाब: अगर मेरे पास दोनों वैक्सीन आसानी से उपलब्ध हैं तो मैं कोवैक्सीन को तरजीह दूंगा. अगर केवल कोविशील्ड ही उपलब्ध होगी तो मैं इसके लगवाने से भी परहेज नहीं करूंगा. कोवैक्सीन को लेकर मौजूद जानकारियों के बारे में जानने के बाद मैं इस वैक्सीन को लेकर ज्यादा आश्वस्त हूं. हालांकि मेरे लिए कोरोना का रिस्क वैक्सीन के साइड इफेक्ट से कहीं बड़ा है. दूसरा कारण यह है कि कोवैक्सीन को लेकर दिए जाने वाले दूसरे डोज़ के बारे में जानकारी है लेकिन एडनोवायरस वेक्टर्ड वैक्सीन के रिपीट डोज़ के बारे में जानकारियां अभी उपलब्ध नहीं है.

सवाल: वैक्सीनेशन के इस दौर में भारत जैसे देश के लिए मौजूदा वक्त की जरूरत क्या है?

जवाब: ऐसा लगता है कि कोरोना महामारी खात्मे की ओर है. एक और दो महीने में स्थिति सामान्य होने के करीब होगी. फिलहाल वायरस के संक्रमण पर रोक लगाने से ज्यादा जरूरी कोरोना से होने वाली मौतों को रोकना है. किन लोगों के लिए कोरोना का खतरा सबसे ज्यादा है? ऐसे लोगों को वैक्सीन के लिए प्राथमिकता दी जा रही है और समय की जरूत भी यही है. दूसरी आवश्यकता यह है कि उन लोगों को कोरोना से बचाया जाए जो पहले से ही गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं. इसके अलावा देश में वैक्सीनेशन के जरिए कोरोना वायरस का खात्मा भी जरूरी है जोकि वायरस के खात्मे का ग्लोबल मॉडल भी है. इसके अलावा शिक्षण संस्थानों में भी वैक्सीन तत्काल प्रभाव से उपलब्ध कराई जानी चाहिए. यहां स्टाफ और अभिभावकों और उम्रदराज अभिभावकों को वैक्सीन की खुराक दी जानी चाहिए.

सवाल: कोरोना के नए स्ट्रेन को लेकर दुनिया कैसे हैंडल करेगी?

जवाब: क्या हमें इंतजार नहीं करना चाहिए? अबतक कोरोना के दूसरे स्ट्रेन के बारे में जानकारी दर्ज नहीं की गई है. हालांकि इसकी संभावना है कि वायरस के एक से अधिक स्ट्रेन हो सकते हैं. वैक्सीन के म्यूटेंट रोकने में वैक्सीन प्रभावी हैं.

सवाल: भारत में लोग अब भारी संख्या में बिना मास्क के बाहर निकल रहे हैं. सिनेमा हॉल और मॉल्स खोल दिए गए हैं. क्या सरकार की तरफ से ऐसी ढील देना सुरक्षित है?

जवाब: रिस्क और फायदे दोनों के आकलन संतुलित करने होंगे. लेकिन सुरक्षा के लिहाज से कोरोना संबंधित सभी एहतियातों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए.

सवाल: बतौर प्रख्यात वायरोलॉजिस्ट आप भारतीय सरकार और यहां के लोगों को क्या सलाह देना चाहेंगे?

जवाब: मुझे नहीं पता था कि मैं प्रख्यात हूं. मैं सरकार को सलाह देने वाला कौन होता हूं. लेकिन लोगों के प्रति मेरी जिम्मेदारी है. मैं पहले से ही मास्क पहनने की बात कहता आया हूं. प्रिंट मीडिया में मैं आम जनता को विज्ञान के तथ्यों के बारे में लेख के जरिए अवगत कराता आया हूं. मुझे एड्स महामारी के बारे में याद आता है. हमने कैसे व्यावहारिक बदलाव, और जागरूकता से इस महामारी के खिलाफ जंग जीती. यह तरीका आसान था साथ ही कारगर भी था. कोरोना के लिए भी यह तरीका कारगर साबित होता. लेकिन नियमों की अनदेखी करना हमारे देश में आदत रही है. स्वास्थ्य मंत्रालय को भी शायद ही पता हो कि हमने उस महामारी के खिलाफ कैसे जंग जीती थी.

सवाल: क्या कोरोना के नए स्ट्रेन के आने की संभावना है, अगर हां तो हमें इसके लिए कैसे तैयार रहना होगा?

जवाब: कोरोना के नए स्ट्रेन की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है, इससे निपटने के लिए हमें सबसे पहले मौजूदा स्ट्रेन के खिलाफ जंग जीतनी होगी. मैंने WHO के डीजी को पहले ही पत्र लिखकर अगली बोर्ड मीटिंग में कोरोना वायरस को खत्म करने के लक्ष्य को एजेंडा बनाने की बात कही है. हमारे स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्ष वर्धन इसके चेयरमैन हैं और डॉ. सौम्या स्वामीनाथन इसकी मुख्य वैज्ञानिक हैं.

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