खुद बेसहारा हुई तो दूसरों का सहारा बनने का लिया संकल्प, अब 80 महिलाओं को दे रहीं रोजगार

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लखनऊ । कोरोना संक्रमण में अपनों की पहचान के साथ दूसरों को सहारा देने का अवसर भी भरपूर मिला। विपरीत परिस्थितिथों में कई लोगों की नौकरी गई तो कुछ को अपना कारोबार ही बदलना पड़ा।राजधानी के चिनहट के लौलाइ गांव की विभा की दास्तां भी कुठ ऐसी ही है।

निशातगंज में एक निजी कंपनी में काम करने वाली विभा की नौकरी लाॅकडाउन में चली गई। खुद को अपने पैरों पर खड़ा कर परिवार को चलाने के चुनौती ने भी उनके हाैसले को कभी कम नहीं होने दिया।

उनका कहना है कि एक ओर जहां दूसरे कामों में वर्क फ्रॉम होम की सुविधा कर्मचारियों को मिल रही थी। वहीं मेरी जॉब में यह संभव नहीं था। मेरे परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। लॉकडाउन के दौरान मुझे प्रवासी श्रमिकों के लिए रोजगार की जानकारी मिली।

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राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन कार्यालय की जानकारी हुई और मैंने प्रशिक्षण के लिए आवेदन किया। मैंने मास्क बनाना सि‍खा। मांग के सापेक्ष मास्क नहीं बना पाई तो अपनी जैसे महिलाओं को अपने साथ जोड़ लिया। मिशन के अधिकारियों ने काम को सराहा और फिर विभा ने 12 महिलाओं का अपना पहला समूह बना लिया।

सभी को 200 से 300 रुपये की आमदनी प्रतिदिन होने लगी। खादी के मास्क की मांग कम हुई तो फिर कपड़े के सिलाई का प्रशिक्षण ले लिया। ग्रामीण आजीविका मिशन के सुखराज बंधु की मदद से कारोबार आगे बढ़़ता गया।

लीड इंडिया महिला स्वयं सहायता समूह के नाम से पहला समूह गठित करने वाली विभा ने ऐसी महिलाओं को जोड़ा जिनकी कोेरोना संक्रमण में नौकरी चली गई या फिर कारोबार बंद हो गया। रोजगार की गारंट और पैसे के समय से भुगतान करने की उनकी मुहिम रंग लाई और वर्तमान में ऐसी 80 महिलाओं को रोजगार देकर नारी सशक्तीकरण का सशक्त उदाहरण बन गईं हैं।

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