केंटोन्मेट: अब ओल्ड ग्रांट बंगलों का तेजी से होगा अधिग्रहण रक्षा मंत्रलय ने व्यवस्था में किया बड़ा फेरबदल

आशीष शुक्ला

जबलपुर यशभारत। केंद्रीय रक्षा मंत्रलय ने ओल्ड ग्रांट संपत्तियों के अधिग्रहण के मामलों में तेजी लाने के लिए पूरा व्यवस्था में व्यापक फेरबदल किया है नई व्यवस्था के लागू होने के बाद अब जमीन अधिग्रहण संबंधी फाइले रक्षा मंत्रलय में धूल नहीं खाएंगी, बल्कि डायरेक्टर जनरल डिफेंस ईस्टेट (डीजीडीई) खुद प्रकरण पर निर्णय लेते हुए कार्रवाई के आदेश जारी कर सकेंगे।

केवल उन्हें कार्रवाई से रक्षा मंत्रलय को अवगत बस कराना होगा। प्रथम दृष्टय भले ही यह बदलवाल सामान्य नजर आ रहा हो,लेकिन जानकारों का मानना है कि अब वर्षो से अटके लीज बंगलों के अधिग्रहण और उसमें अतिक्रमण कर रह रहे लोगो को बेदखल करने की कार्रवाई में तेजी आएगी *सीधे तौर पर कहा जाए तो ऐसे प्रकरणों में राजनैतिक हस्ताक्षेप के चलते जो फाइले रक्षा मंत्रलय में अटकी रहती थी,अब ऐसा नही होगा।

जानकारी के मुताबिक रक्षा मंत्रलय में डायरेक्टर (क्यू एंड सी) के कार्यालय से 28 अक्टूबर को एक पत्र जारी किया गया है। डायरेक्टर जरनल डिफेंस ईस्टेट डीजीडीई दिल्ली को भेजे गए पत्र में स्पष्ट तौर पर इस बात का उल्लेख हैं कि अब ओल्ड ग्रांट संपत्तियों केअधिग्रहण के संबंध में वे खुद निर्णय ले सकते हैं।

लिहाजा वे आवश्यकता के अनुसार आने वाले प्रस्तावों पर तेजी से निर्णय लें। डीजीडीई कार्यालय को अपने निर्णयों के संबंध में केवल रक्षा मंत्रलय को सूचना भेजनी होगी या यूं कहें कि विश्वास में लेना होगा*। इस बदलाव के बाद आर्मी को आवश्यकता के अनुसार भूमि को जल्द से जल्द उपलब्ध कराने के लिए डीजीडीई कार्यालय ओल्ड ग्रांट भूमियों को खाली करा सकेगा।

अभी तक क्या थी प्रक्रिया और क्या थी विसंगति

जानकारों का कहना है कि रक्षा संपदा विभाग आर्मी की जमीनों का प्रबंधन देखता है। लिहाजा आर्मी अपनी आवश्यकता के अनुसार जमीनों को उपलब्ध कराने के लिए उक्त विभाग से पत्रचार करती है। प्रक्रिया के तहत डिमांड आने के बाद रक्षा संपदा विभाग आर्मी के लिए सुरक्षित रखी गई जमीनों व ऐसे संपत्तियां जिनकी लीज समाप्त हो चुकी है या फिर जहां लीज नियमों का उल्लंघन हो रहा है *उन्हें अधिग्रहण करने का प्रस्ताव तैयार कर अंतिम स्वीकृति के लिए रक्षा मंत्रलय भेजता था। जमीनों का प्रबंधन चूंकि रक्षा संपदा विभाग देखता है और फाइल में अंतिम निर्णय रक्षा मंत्रलय के सचिव स्तर के अधिकारी को लेना होता था तो कई बार मामला तकनीकी रूप से उलझ जाता था। क्योंकि जब तक रक्षा मंत्रलय के सचिव को उक्त भूमि से जुड़े दस्तावेजों के संबंध में विस्तृत रूप से नहीं समझा लिया जाता था, अधिग्रहण की अनुमति नही मिलती थी।

इस प्रक्रिया में वर्षो लग जाते है, वहीं कई ऐसे प्रकरण भी हैं जिन पर आज तक अंतिम निर्णय नहीं हो सका है। इस विसंगति को दूर करने के लिए रक्षा मंत्रलय ने यह निर्णय लिया है* कि जमीनों का प्रबंधन देखने वाला संस्थान ही अधिग्रहण पर भी अंतिम निर्णय ले।

लीज शर्तो का उल्लंघन करने वालों की खैर नही

जानकारों का कहना है कि जबलपुर केंटोन्मेंट क्षेत्र में कई बंगले ओल्ड ग्रांट लीज के हैं। *वहीं आर्मी लगातार अपने सेंटर्स से लगी बंगलों व अन्य भूमियों की डिमांड कर रही है। जिसको देखते हुए स्थानीय रक्षा संपदा विभाग ने कई ऐसे ओल्ड ग्रांट बंगल जहां व्यापक पैमाने पर लीज शर्तो का उल्लंघन किया गया है उनके अधिग्रहण का प्रस्ताव बना कर मुख्यालय भेजा हुआ है। खासतौर पर ऐसे ओल्ड ग्रांट लीज बंगले जिसकी खुली जमीनों का बड़े पैमाने में खरीद फरोख्त की गई है। अब ऐसे बंगलों को अवैध कब्जों से मुक्त करा अधिग्रहण संबंधी कार्रवाई को तेजी से अंजाम दिया जा सकता है।