कहीं आप भी तो नहीं करते ऐसी हरकतें, इन लक्षणों से पहचानिये मानसिक रोग

कहीं आप भी तो नहीं करते ऐसी हरकतें, इन लक्षणों से पहचानिये मानसिक रोग
Updated: | Fri, 09 Oct 2020 10:12 PM (IST)
कहीं आप भी तो नहीं करते ऐसी हरकतें, इन लक्षणों से पहचानिये मानसिक रोग
इस रोग से पीड़ित बहुत से लोग हमें अपने आस पास मिल जाते हैं लेकिन हम उन्हें उनकी ज़िद या पागलपन कहकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन यह एक गंभीर मानसिक बीमारी है।
Obsessive Compulsive Disorder : आज हम आपको जिस डिसऑर्डर के बारे में बताने जा रहे हैं, उससे पीड़ित बहुत से लोग हमें अपने आस पास मिल जाते हैं लेकिन हम उन्हें उनकी ज़िद या पागलपन कहकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन यह एक गंभीर मानसिक बीमारी है। इसमें मरीज़ को एक ही तरह के विचार बार बार आते हैं और साथ ही वो एक ही तरह का व्यवहार बार बार दुहराता है। इस डिसऑर्डर को हम “Obsessive Compulsive Disorder ” के नाम से जानते हैं। यह एक पर्सनालिटी डिसऑर्डर भी है। इस डिसऑर्डर में मरीज़ की जीवनचर्या पूरी तरह से प्रभावित हो जाती है इस वजह से वो अच्छी ज़िन्दगी कभी जी नहीं पाते। यह बहुत ही परेशान करने वाली अवस्था होती है और इसमें मरीज़ इससे बुरी तरह प्रभावित रहते हैं।

OCD में दो चीज़ें होती है, एक obsession और दूसरा compulsion । ओबसेशन मतलब बार-बार आने वाले विचार, जो मरीज़ के दिमाग में बार बार आते हैं। इससे जो एंग्जायटी पैदा होती है उसे कम करने के लिए मरीज़ जो व्यवहार करता है उसे Compulsion कहते हैं।

इस मानसिक रोग में मरीज़ के दिमाग में जो विचार, जो ओबसेशन आते हैं वो हैं-

  1. Hygiene – इसमें उन्हें कीटाणुओं का सबसे ज़्यादा डर बना रहता है। उसे बीमार होने का सबसे ज़्यादा डर बना रहेगा। उसको हमेशा अपने हाथ गंदे लगते है और वो बार-बार उसे धोता है। यह विचार उसके दिमाग में लगातार चलते रहते हैं।

  2. Perfection- इसमें मरीज़ को हर चीज़ उत्तम चाहिए। जैसे अगर उसकी बेड शीट या शेल्फ में रखी किताब अगर थोड़ी भी टेढ़ी है तो वो उसे ठीक करेगा, बार बार घर में सेटिंग करता रहेगा। अगर वो ठीक भी है तो उसे उसमे तसल्ली नहीं मिलेगी, वो बार बार उसी के पीछे लगा रहेगा।

  3. Aggressive Behaviour- इसमें साथ ही साथ मरीज के मन में अग्रेसिव विचार आते रहते हैं। जैसे कि वो अपने आप को न नुकसान पहुंचा दे या वो अपने आस पास के लोगों को नुकसान पहुंचा दे। महिलाओं को ये लगता है कि कहीं वो अपने बच्चे को ही न नुकसान पहुंचा दे। इसके साथ ही उनके मन में सेक्सुअल विचार आते हैं। जैसे उन्हें अपने किसी रिश्तेदार को लेकर सेक्सुअल विचार आते हैं। कभी कभी वो अपने भगवान् या अपने आराध्य को लेकर ही ऐसे थॉट्स आ जाते है और बार-बार आते हैं। इसकी वजह से मरीज़ बहुत ज़्यादा अपराध-बोध में रहता है। जानने वाली बात ये है कि मरीज़ को पता है कि वो ऐसी चीज़ें कभी नहीं करेगा लेकिन वो अपने आने वाले विचार को रोक नहीं पाता।

  4. अब Compulsion की बात करे तो इसमें वो व्यवहार आते हैं जो इन सारे विचार या ओबसेशन जो लगातार मरीज़ में मन में चल रहे हैं, उनसे होने वाले एंग्जायटी को कम करने के लिए जो मरीज़ करता है।

  5. Excessive Cleaning – ऐसी अवस्था में मरीज़ बार बार अपने हाथ धोता है। उसे लगेगा कि उसके हाथ गंदे हैं। वो हर थोड़ी देर पर अपने हाथ को धोएगा। साथ ही साथ वो अगर एक बार नहा भी लेता है तो उसे लगेगा की कुछ कमी है वो फिर से नहायेगा। कभी कभी तो वो ८-१० बार नहा लेते है। कुछ मरीज़ तो अपनी त्वचा को छील भी लेते है।

  6. Excessive Arranging- बार बार घर को ठीक करना। एक सुई भी इधर से उधर होने नहीं देते।

  7. Repeat Checking – मरीज़ हर थोड़ी देर पर अपने बैग को खोलकर देखता है कि उसने अपने सामान बैग में रखे या नहीं। घर का दरवाज़ा लॉक किया या नहीं। कई बार तो मरीज़ बाहर से वापस आकर चेक करता है कि दरवाज़ा ठीक से बंद किया नहीं। हम सब अपनी की हुई चीज़ों को दुबारा चेक करते हैं लेकिन OCD का मरीज़ ऐसी चीज़ें बार-बार करता है। कुछ मरीज़ को बार-बार गिनती करने की आदत हो जाती है। वो लगातार पैसे को गिनने लगते हैं।

यह 2 तरह का होता है। एक Mild OCD और दूसरा Severe OCD.

माइल्ड में सिर्फ ओबसेशन आते हैं। इसमें मरीज़ सिर्फ विचार तक सीमित रहता है। माइल्ड अवस्था में मरीज़ ज़्यादातर ऐसे विचार को छुपा लेते हैं क्यूंकि उनको social stigma का डर होता है। उसे लगता है लोग क्या सोचेंगे। लोग उसे ही गलत बोलेंगे, वो शर्मिंदा न होने की वजह से उसे छुपा लेते हैं।

OCD का एक cycle होता है। पहले इंसान को ओबसेशन यानि विचार आएंगे फिर उसकी वजह से एंग्जायटी होगी और एंग्जायटी को कम करने के लिए वो compulsive behaviour करेगा यानि ऐसा कोई व्यवहार करेगा जिससे उसे थोड़े देर के लिए सुकून मिल सके। थोड़ी देर के सुकून के बाद मरीज़ फिर से ओबसेशन की तरफ चला जाता है। यह दौर कहीं रुकता नहीं है और ये चक्र चलता रहता है।

मरीज़ अगर व्यस्क है तो वो समझता है कि उसके विचार irrational है लेकिन अगर मरीज़ एक बच्चा है तो उसे ये बात समझ नहीं आएगी। इसलिए उसके अभिभावक या शिक्षक को ये चीज़ समझना ज़रूरी होता है। वो ही इसे पहचान सकते हैं। इसमें मरीज़ की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। वो अपने सोच में इतना उलझ जाता है कि वो कुछ और सोच ही नहीं पाता।

यह डिसऑर्डर कई कारणों से हो सकता है। जैसे जेनेटिक,एनवायर्नमेंटल इफ़ेक्ट, दिमागी संरचना और इन्फेक्शन।

हमें ऐसे मरीज़ को उनका पागलपन समझ कर नकार देने की बजाय उन्हें साइकेट्रिस्ट या थेरेपी के लिए ले जाना चाहिए। साथ ही साथ हमें खुद के अंदर भी झांककर देखना होगा कि कहीं हम भी तो इस बीमारी से ग्रसित तो नहीं हैं। इसमें medication और psychotherapy दोनों चलाई जाती है। दुनिया में ऐसी बहुत कम बीमारियां है जिनका अगर समय रहते इलाज हो जाये तो वो ठीक नहीं हो सकती। खासकर हमें अपने मेन्टल हेल्थ को लेकर बहुत जागरूक होने की ज़रुरत है..।