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यही आलम रहा तो गुजरात जैसा हाल होगा कांग्रेस का

जबलपुर, नगर प्रतिनिधि। गुजरात चुनावों के परिणाम सामने आने के बाद कांग्रेस हार के भी जीत जैसा इजहार कर रही है। मन को दिलासा देने के लिए तो ये बातें अच्छी लग सकती हैं लेकिन जीत जीत होती है और हार हार होती है।

 

वे पहुंचे बूथ स्तर तक यहां अभी अध्यक्ष का इंतजार

भाजपा अपने संगठन और परिश्रम के बल पर कांग्रेस के मुंह से जीत छीनकर ले आयी। अब 2018 में मप्र सहित दो और भाजपा शासित राज्यों में चुनाव होने हैं जहां पर भाजपा का संगठन मजबूत स्थिति में है और कांग्रेस की हालत गुजरात जैसी है। हालांकि यहां अभी चुनाव में लगभग एक साल से कम का समय है फिर भी यहां कांग्रेस गुजरात जैसे हालात बनने का इंतजार कर रही है।

जबकि 15 साल सत्ता रहने के बाद भाजपा एंटीइनकमवेंसी को भांपते हुए संगठन को मजबूत करने में लगी हुई है।

बूथ तक है पहुंच
भाजपा ने संगठन की रचना इतनी मजबूत कर ली है कि उसके पास प्रदेश, संभाग, जिला, मण्डल, बूथ और बूथ के नीचे पन्ना प्रभारी तक के दायित्ववान लोग हैं। सीधे शब्दों में कहें तो भाजपा का संगठन मेन टू मेन मार्किंग करने की स्थिति में आ गया है। भाजपा ने पन्ना प्रभारी बनाकर एक-एक घर और एक-एक मतदाता के पीछे अपना एक कार्यकर्ता खड़ा कर दिया है।

खुद का नहीं पता
दूसरी तरफ कांग्रेस की बात करें तो यहां संगठन के नाम पर ‘स’ भी नहीं है। बूथ प्रभारी और पन्ना प्रभारी तो बहुत बड़ी बात है यहां तो प्रदेश अध्यक्ष को ही नहीं पता कि चुनाव में उनकी क्या भूमिका रहेगी या चुनाव तक वे रहेंगे या नहीं रहेंगे। यही आलम रहा तो चुनावों के ठीक पहले जैसे गुजरात में विधायकों ने पाले बदले थे वैसा कुछ मप्र में भी हो सकता है और फिर आखिरी एक माह में राहुल गांधी 10-20 रैली करने के बाद कहेंगे कि हम जमकर लड़े।

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