शिअद से अलगाव भाजपा के समक्ष चुनौती के साथ पंजाब में पांव पसारने का अवसर भी

चंडीगढ़। कृषि विधेयकों को लेकर शिरोमणि अकाली दल ने भारतीय जनता पार्टी से नाता तोड़ा है उसे देखते हुए अब पंजाब में भाजपा के समक्ष अपना आस्तित्व बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

इसके साथ ही अब तक पंजाब की 117 सीटों में से मात्र 23 सीटों पर चुनाव लड़ती रही भाजपा को अब पूरे प्रदेश में अपना विस्तार करने का अवसर भी मिल गया है।  यह पार्टी नेताओं पर निर्भर करेगा कि वह अकाली दल से अलग होकर भाजपा का कितना आधार बढ़ा पाते हैैं।

 

 

प्रदेश महासचिव ने कहा, अब उन क्षेत्रों में भी जड़ें जमाने का मौका मिलेगा जहां पहले गए नहीं

। ऐसा नहीं है कि पार्टी कभी अकाली दल से अलग नहीं होना चाहती थी, ऐसी कोशिश भाजपा की प्रदेश इकाई ने कई बार किया। परंतु हर बार पार्टी हाईकमान के दबाव में उसे मात्र 23 सीटों पर ही सिमटना पड़ा। अब भाजपा के पास बड़ा अवसर है कि वह राज्य की सभी 117 सीटों पर अपना आधार बढ़ाए।

अब 23 सीटों से आगे बढऩे की होगी कवायद, पहली चुनौती नवंबर होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव

पिछले कुछ समय से भाजपा में भीतर ही भीतर यह सुगबुगाहट होती रही है कि या तो अलग लड़ा जाए या फिर सीटों का कोटा बढ़ाया जाना चाहिए।

भाजपा का शहरी आधार रहा है लेकिन उसने देहात में भी पकड़ बनाने की कोशिश शुरू कर दी थी। लेकिन अब किसान बहुल देहात इलाके में उसके लिए राह और कठिन हो सकती है।

 

कृषि विधेयकों के बारे में किसानों की शंकाएं दूर करने के लिए भाजपा ने गांवों में जाकर जनसंपर्क करने की योजना बनाई तो कई किसान संगठनों ने एलान कर दिया है कि भाजपाइयों को गांवों में घुसने नहीं देंगे।

शहरों का आढ़ती वर्ग, जो पार्टी का कोर वोट बैंक भी है, इस समय खासा नाराज है। बात केवल आढ़तियों की नहीं है बल्कि उनके साथ जुड़ा हुआ व्यापार मंडल, शैलर उद्योग, करियाना व्यापारी भी अब भाजपा के खिलाफ हो रहे हैं।

भाजपा ने नवंबर या दिसंबर महीने में होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी। अब इस चुवान में भाजपा को अकेले मैदान में उतरना पड़ेगा और यह उसके लिए पहली कसौटी होगी।

 

भाजपा के प्रदेश महासचिव डॉ. सुभाष शर्मा ने कहा, जब कृषि अध्यादेश जारी किए गए थे तो शिरोमणि अकाली दल पूरा साथ दे रहा था। हमें उम्मीद थी कि पार्टी किसान वर्ग को इन बिलों के बारे में समझाने में केंद्र सरकार को सहयोग करेगी। परंतु अकाली दल के पास अब एनडीए को छोडऩे के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। दो महीने बाद पंजाब में स्थानीय निकाय के चुनाव होने हैं।

उन्‍होंने कहा कि खेती विधेयकों का जिस तरह से अकाली नेता विरोध कर रहे हैं उसे देखकर लगता ही नहीं था कि अब हम दोनों एक साथ चल सकते हैैं। हमारे पास अब उन इलाकों में जाने का मौका आ गया है जहां अभी तक हम कभी गए ही नहीं। नई जगह जड़ें जमाना आसान नहीं होगा लेकिन अब यह हमारी मेहनत पर निर्भर करेगा कि हम इन जगहों पर अपनी जड़ें कितनी जल्दी जमाते हैं। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और यहां तक कि अकाली दल से भी कई नेता भाजपा के साथ जुडऩा चाहते हैं। हमने स्थानीय निकाय चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है।

 

शर्मा ने कहा कि हम इसका आकलन कर रहे हैं कि क्या यह विरोध सचमुच बिलों के कारण हो रहा है या फिर हमें कमजोर करने के लिए जानबूझकर करवाया जा रहा है। मुझे उम्मीद है कि जब रविवार को धान की खरीद शुरू हो जाएगी और अगले पूरे महीने किसान धान की कटाई, इसे बेचने और गेहूं की बुआई में व्यस्त हो जाएंगे तो उनका यह गुस्सा ठंडा हो जाएगा। फसल बढिय़ा ढंग से खरीदी गई तो किसानों को भी यह बात समझ आ जाएगी कि जो हम बिलों के बारे में कह रहे हैं वह सही है और चुनाव आने तक हम उनके इस गुस्से को ठंडा करने में कामयाब हो जाएंगे।