Vikas Dubey Encounter: यह तो होना ही था, सड़े हुए पुलिसिया तंत्र का नमूना है विकास दुबे कांड

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कानपुर के बिकरु गांव में उत्तर प्रदेश पुलिस और कुख्यात अपराधी विकास दुबे की मुठभेड़ पिछले एक सप्ताह से उत्तर प्रदेश की सियासत में तूफान लेकर आई है। शुक्रवार सुबह पुलिस ने विकास दुबे को मुठभेड़ में मार गिराया, लेकिन पुलिस की थ्योरी किसी को नहीं पच रही है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अनुसार पुलिस की गाड़ी पलटी नहीं बल्कि पलटाया गया है। अखिलेश यादव ने इसे विकास दुबे से जुड़े राज पर पर्दा डालना बताया है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने इस मामले में एक बार फिर उत्तर प्रदेश सरकार की व्यवस्था पर हमला बोला है।

वहीं इंस्टीट्यूट ऑफ कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट के अजय साहनी का कहना है कि यह तो होना ही था। उन्हें पहले दिन से ही पता था। अजय साहनी कहते हैं कि यह उत्तर प्रदेश पुलिस के सड़े हुए सिस्टम का नमूना है।

उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक, बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक और पुलिस सुधार के मर्मज्ञ प्रकाश सिंह ने कहा कि थोड़ा सा इंतजार कीजिए।
असत्य मेव जयते लिखिए!

अजय साहनी ने कहा कि अब झूठ का कारोबार चल रहा है। पुलिस को देश के न्यायतंत्र पर भरोसा नहीं है। न्यायतंत्र अपनी गरिमा खो चुका है। जनता को पुलिस पर स्तर का भरोसा नहीं है। अपराधी अब पहले से ज्यादा खूंखार हो गए हैं।

उनका राजनीतिक संरक्षण उन्हें बचा लेता है। साहनी कहते हैं कि मुझे मुड़कर देखिए तो पता चलेगा कि आखिर विकास दुबे इतना खूंखार अपराधी कैसे बन गया? निश्चित रूप से उसे बचाने वाले आका हैं।

ऐसे में पुलिस को लगता है कि जेल जाएगा, कानूनी प्रक्रिया शुरू होगी, कुछ दिन में लोग सब भूल जाएंगे। इसके बाद संरक्षण देने वाले भी विकास जैसे अपराधी को बचा लेंगे।

इसलिए वह इस तरह की मुठभेड़ को अंजाम दे देती है। अजय साहनी का कहना है कि लोकतंत्र में भरोसा बड़ी चीज है। जब विश्वास खत्म हो जाता है, तो हर कोई हथियार उठा लेता है।

उन्होंने कहा कि मेरे विचार में इस समय एतबार का संकट है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने तो इसका सबसे खराब नमूना पेश किया है।
ऐसे अपराधी को दुनिया में कोई जिंदा नहीं छोड़ता

अजय साहनी कहते हैं कि अमेरिका का उदाहरण लीजिए। वहां पुलिस पर हमला करने वाला चलती-फिरती जिंदा लाश समझा जाता है। पुलिस या तो उसे मुठभेड़ में मार देती है या फिर वहां का कानून उसे सूली पर चढ़ा देता है।

दुनिया के सभी देशों में इसी तरह होता है। हमारे यहां थोड़ी स्थिति जटिल हो गई है। कानून व्यवस्था बेहद लचर है। इसलिए पुलिस ऐसे कुख्यात अपराधी को मौका देखकर खत्म कर देने में ही अपनी और समाज की भलाई समझती है।

पुलिस वाले कहीं और से नहीं आते

अजय साहनी का कहना है कि इसमें जल्दबाजी जैसा कुछ नहीं है। कई बार इस तरह की स्थितियां आ जाती हैं। साहनी का कहना है कि यह मामला अदालत में भी जाना तय है।

कुछ लोग उत्तर प्रदेश पुलिस की मानवाधिकार आयोग में शिकायत भी करेंगे? सह सब चलता रहेगा। साहनी के अनुसार इस मामले को शुरू से देखिए। शातिर अपराधी ने पुलिस थाने में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त व्यक्ति की हत्या की।

संदेह के लाभ में बाइज्जत बरी हो गया। यहां भी पहले पुलिस ही मुखबिर, पुलिस की छापेमारी, पुलिस वालों की मौत और अंत में पुलिस के साथ मुठभेड़ में अपराधी खुद मारा गया।

आप पुलिस पर ही सवाल मत उठाइए। पूरे समाज पर उठाइए। पुलिस के लोग भी इसी समाज से आते हैं। कुछ अच्छे ईमानदार होते हैं तो कुछ भ्रष्ट और भरोसा तोड़ने वाले भी होते हैं।

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