जानिए ताज़ा विवाद में घिरे कथावाचक मोरारी बापू हाई प्रोफाइल संत स्‍टोरी

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रामकथा के वाचन के लिए विश्वविख्यात मोरारी बापू ने पिछले दिनों कृष्ण कथा सुनाते हुए ऐसे प्रसंगों को छेड़ दिया कि न सिर्फ अहीर समाज बल्कि हिंदू (Hindu) समाज की भावनाओं को ठेस लगी. अंजाम हुआ कि ​कथित तौर पर बापू को माफी भी मांगनी पड़ी, फिर भी Dwarka में उन पर BJP नेता ने हमले की कोशिश की. सियासत (Politics) से उद्योग परिवारों (Industry) तक पहुंच रखने वाले बापू के बारे में कुछ खास बातें (Interesting Facts) आपको हैरत में डाल सकती हैं.

पहले ताज़ा घटना देखें तो कुछ दिनों पहले ही उत्तर प्रदेश में एक कथावाचन के दौरान मोरारी बापू ने कहा था कि श्रीकृष्ण की द्वारका में शराब का चलन बढ़ गया था. इसी कथा में कथित तौर पर बापू ने श्रीकृष्ण के भाई बलराम के शराबी होने की बात भी कही, जिसका वीडियो वायरल हुआ. इसके बाद हिंदू समाज की आपत्तियों के बाद बापू ने कथित तौर पर माफी मांगने का वीडियो भी जारी किया.

गुजरात के द्वारका में भाजपा के नेताओं से मुलाकात कर इस पूरे प्रकरण के बारे में बातचीत करने पहुंचे बापू दर्शन से लौट रहे थे. खबरों के मुताबिक तभी भाजपा के पूर्व विधायक पबुभा माणेक ने बापू पर हमले की कोशिश की, जिन्हें भाजपा सांसद पूनम माडन ने रोका, हालांकि माणेक ने गाली गलौज ज़रूर की. यह किस्सा कहां पहुंचेगा, पता चलेगा लेकिन पहले भी विवादों और कई खबरों में रहे मोरारी बापू के फैक्ट्स जानना बहुत दिलचस्प है

टॉयलेट से लेकर सेक्सवर्करों तक के लिए कथा
पहले चूंकि सकारात्मक पक्षों पर बात करना चाहिए इसलिए जानिए कि मोरारी बापू सामाजिक सुधार के कदमों के लिए लगातार सुर्खियों में रहे हैं. सामाजिक सरोकारों के लिए वो अपने कथावाचन के माध्यम से करोड़ों रुपयों की रकम जुटाकर संस्थाओं और सामाजिक हितों के लिए दान करते रहे हैं. कई मामलों में उन्हें पहला संत या धार्मिक व्यक्तित्व कहा जाता है, जिसने इस तरह के मुद्दों के लिए रामकथा का उपयोग किया.

साल 2005 में सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण के लिए कथा के माध्यम से फंड जुटाना रहा हो, या 2016 में ट्रांसजेंडरों और 2018 में सेक्सवर्करों के ​कल्याण के लिए कथा के माध्यम से आर्थिक मदद कर बापू रामकथा को अंतिम जन तक पहुंचाने का मिशन रखा. मरीज़ों, कैदियों, सैनिकों, बेटी बचाओ अभियान जैसे मुद्दों के लिए कथावाचन कर चुके बापू के श्रोताओं व दर्शकों में धर्म, जाति व लिंग जैसे आधारों पर भेदभाव नहीं किया जाता.

दुनिया भर में कथावाचन से शोहरत
गुजरात में जन्मे और 1960 के दशक में रामप्रसाद महाराज के सान्निध्य में पहली बार रामचरित मानस का वाचन करने से लेकर अब तक मोरारी बापू 800 से ज़्यादा कई दिनों का कथावाचन कार्यक्रम कर चुके हैं. वह भी दुनिया के कई हिस्सों में. 1976 में नैरोबी में कथावाचन के साथ पहली बार उन्होंने विदेश में रामकथा कही थी. इसके बाद अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका के देशों समेत एक क्रूज़ शिप, दुनिया की सैर पर निकले हवाई जहाज़ के साथ ही चीन की सीमा में कैलाश पर्वत के नीचे भी कथावाचन किया.

अब बात पिछले ‘नीलकंठ’ विवाद की
सितंबर 2019 की बात है, जब मोरारी बापू के ​एक बयान से इस विवाद की शुरूआत हुई थी. बयान कुछ इस तरह था :

नीलकंठ अभिषेक की के बारे में कान खोलकर समझ लो, शिव का ही अभिषेक होता है. अपनी-अपनी शाखा में कोई नीलकंठ अभिषेक करे तो ये नकली नीलकंठ है, कैलाश वाला नहीं. नीलकंठ वही है, जिसने ज़हर पिया है. जिसने लाडूडी (एक प्रकार का छोटा लड्डू) खाई है, वो नीलकंठ नहीं है.

मोरारी बापू ने इस बयान में स्वामीनारायण संप्रदाय को निशाने पर लिया था क्योंकि वहां लाडूडी प्रसाद के रूप में दी जाती है और स्वामीनारायण का दूसरा नाम नीलकंठ भी है. बापू के इस बयान के बाद दोनों पक्षों के बीच खूब बयानबाज़ी हुई और फिर ये बहस सनातन धर्म बनाम स्वामीनारायण संप्रदाय की हुई. इस विवाद में न केवल लेखक और कलाकार कूदे बल्कि राजनीतिक रैलियां भी हुईं. फिर मोरारी बापू ने एक और बयान दिया था, ‘राम और कृष्ण को दर​किनार कर ये लोग अपने संतों का जाप कर रहे हैं.’

मोदी से लेकर अंबानी तक कितनी पहुंच?
कम ही लोग जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘फकीर’ कहने वाले मोरारी बापू ही थे. गुजरात में एक रामकथा के दौरान उन्होंने यह बात तब कही थी जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. राजनीति से खुद को दूर बताने का दावा करने वाले बापू की खासियत यह रही है कि मोदी उनके श्रोता भी रहे, नतमस्तक भी दिखे और 2019 के आम चुनाव से पहले बापू ने यह भी कहा कि मोदी की देशभक्ति पर सवाल नहीं किया जा सकता.

दूसरी तरफ, जब देश के प्रमुख औद्योगिक घराने में दो भाइयों मुकेश और अनिल अंबानी के बीच दरारें आ गई थीं, तब उनकी मां कोकिलाबेन ने बापू की मदद से कलह सुलझाने की कोशिश की थी. बीबीसी की रिपोर्ट की मानें तो मोदी से अंबानी तक पहुंच रखने वाले बापू ने मध्यस्थता की बात खुलकर कही भी थी.

राम मंदिर को लेकर आक्रामक बयान देते थे बापू
खुद को रामभक्त कहने वाले मोरारी बापू कुछ समय से विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे सुरों में आक्रामक ढंग से राम मंदिर को लेकर बात नहीं करते, लेकिन सरकारों और अदालतों के सामने हमेशा अयोध्या में राम मंदिर के समर्थक रहे. वहीं, 1992 के समय में बापू आक्रामक ढंग से राम मंदिर की स्थापना के लिए प्रचार और बयान जारी करते थे. बापू में बदलवा के बारे में पत्रकार रमेश ओझा के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया कि :

जब देश में सांप्रदायिक मानसिकता उभर रही थी, तब मोरारी बापू ने राम मंदिर के लिए ले शिला पूजन किया था… धीरे-धीरे उनमें बदलाव आया और वक़्त के साथ वो धर्म की राजनीति से दूर होते गए.

क्या सत्ता के पक्ष में बने रहे बापू?
गुजरात के 2002 के दंगों के बाद मोरारी बापू ने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए कुछ कदम उठाए थे, लेकिन दंगों में मोरारी बापू के साथ शांति यात्रा में मौजूद रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश शाह की मानें तो यह राजनीतिक कदम ही ज़्यादा मालूम हुए. बीबीसी ने शाह के हवाले से लिखा :

उस समय मोरारी बापू ने कहा कि कुछ चीज़ें नहीं करनी चाहिए लेकिन देखा जाए तो ऐसा लगता था कि उनका रुख़ सत्ता की तरफ ही था… मोरारी बापू का इम्प्रेशन ऐसा रहा कि उनका झुकाव सत्ता के प्रति ही था.

इसका एक और उदाहरण साल 2008 में महुवा में भड़के किसान आंदोलन में दिखा. उस समय गुजरात में बड़े बड़े निवेशों के लिए किसानों की ज़मीनों पर नज़र डाली गई थी. तब भाजपा के ही विधायक रह चुके कनुभाई कलसरिया की अगुवाई में तत्कालीन सीएम मोदी सरकार के खिलाफ बड़ा किसान आंदोलन हुआ था. तब किसानों ने मोदी तक उनकी भावना पहुंचाने की अपेक्षा मोरारी बापू से की थी.

इसके बावजूद बीबीसी को कनुभाई ने बताया था कि बापू ने आंदोलन से दूरी ही बनाए रखी. चूंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, तब बापू ने कनुभाई को उद्योगपतियों के साथ संवाद के ज़रिये हल ढूंढ़ने के लिए बुलाकर बात की थी. हालांकि कनुभाई के मुताबिक उम्मीद यही की गई कि किसान पीछे हटें.

 

कुल मिलाकर मोरारी बापू देश के वो प्रख्यात धार्मिक व्यक्तित्व हैं, जिनके संबंध शीर्ष राजनीतिज्ञों के साथ हैं, जो प्रमुख औद्योगिक घरानों को सलाह देते रहे हैं, जो कभी किसी मंच पर प्रवीण तोगड़िया, अशोक सिंघल और साध्वी ऋतंभरा के साथ नज़र आ चुके तो कभी अपने आश्रम में रवीश कुमार जैसे पत्रकारों को बुला चुके हैं. सूरत के हीरा व्यापारियों से दुनिया भर के उद्योगपति उनके अनुयायियों में शुमार हैं.

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