अक्षयवट तीर्थराज प्रयाग का छत्र, इसके मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और शिखर पर शिव – मोरारीबापू 

प्रयागराज । गंगा, यमुना और सरस्वती का जो संगम है, यहां छत्र के रूप में अक्षयवट इसकी शोभा बढ़ा रहा है। यह राजाधिराज तीर्थराज प्रयाग का छत्र है।

अक्षयवट के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और शिखर पर शिव है। गंगा और यमुना का यह जल संग्रह है इसमें हमें छत्र के दर्शन होते हैं। तीर्थराज स्वयं राजाधिराज है।

यह संगम उसका सिंहासन है। यह बात संत कृपा सनातन संस्थान नाथद्वारा की और से आयोजित  “मानस अक्षयवट” कथा के चौथे दिन मंगलवार को कथा मर्मज्ञ मोरारीबापू ने कही। अरैल घाट पर चल रही कथा में मोरारीबापू ने कहा कि छत्र मर्यादा और वैराग्य का दर्शन है। इसकी अपनी महिमा है।

तुलसीदास कहते हैं कि सिंहासन संगम होना चाहिए। साधु भी सबका समादर करते संगम रचे। ऐसे सिंहासन ही शोभते है। जहां सबको मिलाना है, वह सिंहासन है, वह संगम है। संत, महात्माओं के ऊपर जो छत्र है, वह वैराग्य के समान है। उसकी आलोचना न की जाए। छत्र की महिमा है।

सबको मिलाया जाए, यही भारतीय वैदिक परंपरा

मोरारीबापू ने कहा कि जहां संगम है, वहां स्थिरता है। तीर्थ राज में संगम होता है। गंगा और यमुना जहां मिलती है, वहां का जल कुछ पल के लिए स्थिर हो जाता है। संगम में स्थिरता है। संगम ही स्थिरिय है। अर्थात जहां मिलन है, वहां ठहराव जरूरी है। जहां मिलन हो, संगम हो, वहीं शोभायमान सिंहासन है। सबको मिलाया जाए, यही वैदिक परम्परा है। भारतीय वैदिक परंपरा ने तो यहीं संदेश दिया है। मेरी व्यासपीठ पर सबका स्वागत है, यहां अच्छे लोगों और फरेबियों का भी स्वागत है।  जिसका जो इरादा हो वो, वो जाने, मेरा तो यही इरादा है। बापू कहते हैं कि संगम तो साधु करेगा। जो सियासत करे, उसकी साधुता को भी मेरा नमन। सत्ता में राजनीति हो सकती है, संत में नहीं। पद में राजनीति हो सकती है, पादुका में नहीं।।

छत्र के छः रूप, बुद्धपुरुष का सिर पर हाथ भी छत्र छाया

“मानस अक्षयवट” के दौरान मोरारीबापू ने कहा कि छत्र हमेशा रहता है। अक्षयवट हमेशा रहता है। हमारा छत्र आसमान है। जब सूरज, चाँद नहीं रहेंगे, तब भी हमारा छत्र आसमान रहेगा। अक्षयवट तीर्थराज का छत्र है। छत्र, सम्मान, आदर्श, मर्यादा, सुरक्षा, अभिमान की आड़ और छाया है। बापू कहते हैं कि जिम्मेदार व्यक्ति का सिर खुला नहीं होना चाहिए। हमारे सिर पर बुद्धपुरुष रूपी हाथों का छत्र जरूर होना चाहिए। जिस तरह सिर पर सीधे कोई वस्तु उठाने पर भार ज्यादा लगता है, लेकिन वस्तु और सिर के बीच कपड़ा रख देने से भार कम लगता है, उसी प्रकार हमारे सिर पर किसी बुद्धपुरुष का हाथ होना चाहिए, जिससे कितनी भी जिम्मेदारियां हो, कम लगेगी। बुद्धपुरुष वह है जो समाज के सुधार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले। बापू ने कहा कि स्थिर छत्र अभंगता, अटलता का संदेश देता है, जबकि घूमता हुआ छत्र सबका होने की बात करता है। स्थिर छत्र विपत्ति में काम आता है, घूमता हुआ छत्र मनोरंजन में काम आता है।

जो सीरियस बना दे वह क्या, धर्म में आदमी मुस्कुराना चाहिए

मोरारीबापू ने कहा कि जो धर्म आदमी को सीरियस बना दे, वह क्या है। धर्म में तो आदमी मुस्कुराना चाहिए। मुस्कुराना स्वर्ग है, मुंह चलाना और चिढ़ाना नरक है। बापू कहते हैं कि नाचों, गाओं, झुमों खूब आनन्द करो, बस इतना याद रहे कि आपने मोरारीबापू की कथा सुनी है। ज़माने ने बुद्ध को भी लाफिंग बुद्धा बना दिया। बापू ने कहा कि हमें अकेले में प्रभु का ध्यान करना चाहिए। अगर आप  ढोलक बजाते हो तो शिव के गर्भगृह में जाकर बजाओ। वहां न खिड़की हो, न पंखा हो, न जल की बूंदे गिरे, बस तुम और शिवलिंग हो। जब शिवलिंग से फूल गिर जाए तो सोचना कैलाश ने दाद दी है। बापू कहते हैं कि तुलसी का राम आंखों से, वचनों से और मुस्कुरा करके भी कृपा करते हैं। अपने को ऐसा बनाओं कि प्रभु को आप न दिखो तो वह आपको याद करे, कि मेरे भक्त को क्या हुआ है।

परमात्मा के चरणों में 48 प्रकार के चिन्ह, तीसरा छत्र

“मानस अक्षयवट” कथा  के दौरान मोरारीबापू ने कहा कि परमात्मा के चरणों में 48 प्रकार के चिन्ह मौजूद है, इसमें तीसरा चिन्ह “छत्र” है। इसमें प्रभु श्रीराम के बाएं पैर में 24 और सीता के दाएं पैर में 24 चिन्ह है, इस प्रकार दोनों को मिलाकर 48 चिन्ह उनके पैरों में मौजूद है। परमात्मा का छत्र उनके चरण में है। क्योंकि परमात्मा शोभा का गुलाम नहीं है। सारे छत्र परमात्मा के दासी है। बापू कहते हैं कि जानकी इन्हीं चिन्हों को देखा करती थी और प्रभु को याद करती थी। बापू ने यह भी कहा कि छत्र को पकड़कर साथ चलने वाले को भी छत्र छाया मिलती है। बापू ने कहा कि जो इंसान है, वह गलतियां करेगा। इसमें इतना हंगामा नहीं होना चाहिए। गलतियां नहीं करेगा तो वह फरिश्ता हो जाएगा। बापू कहते हैं कि राम जीवन देता है और कृष्ण जीवन रस देने वाला है। राम मर्यादा देते हैं, जीवन को एक मार्ग पर चलाने का तो कृष्ण उस जीवन में रस भरते हैं। बापू ने कहा कि आप मुझे साल के 9 दिन दीजिए, मैं तुम्हें नवजीवन दूंगा।

बाप-बेटी का रिश्ता विशेष, कन्या सदैव श्रोता रहती

“मानस अक्षयवट” के दौरान मोरारीबापू ने कहा कि बाप और बेटी का रिश्ता विशेष होता है। कई पिता ऐसे होते हैजो कठोर होते हैं, धैर्य वाले होते हैं, अर्थात अगर उनका कोई स्नेही किसी दुर्घटना में बिछड़ जाए तो भी उसके आंखों से आंसू नहीं आते हैं। भले ही पिता का दिल टूट जाए, जीवन टूट जाए, लेकिन रोएगा नहीं। लेकिन वहीं पिता जब अपने बेटी को विदा करेगा, तो उसकी आंखें जरूर भीगेंगी। बापू कहते हैं कि बेटी सदैव श्रोता होती है, वह सबकी सुनती है,  बेटी श्रोता ही रहती है। यही भारतीय नारी है।

शिव ब्याह की सुनाई कथा, श्रीराम, जयराम पर झमें भक्त

“मानस अक्षयवट” के दौरान मोरारीबापू ने शिव ब्याह की कथा सुनाई। बापू ने बताया कि कैसे दक्ष कन्या के रूप में शिव के त्याग के बाद सती बनकर शिव को पाने के लिए हिमालय पुत्री तपस्या करती है और इधर, शिव वियोग में समाधि लगा देते हैं। ऐसे में प्रभु जाकर शिव से पार्वती से शादी करने का वर मांगते हैं और शिव भरते हैं। बापू ने बताया कि कैसे सप्तऋषि पार्वती की परीक्षा लेने जाते हैं और उसके बाद शिव की बारात जाती है और शिव- पार्वती का ब्याह सम्पन होता है। इस दौरान मोरारीबापू ने श्रीराम… जयराम पर भजन कीर्तन किया, जिसपर पांडाल में बैठा  हजारों भक्तों का हुजूम मोरारीबापू की तरफ हाथ फैलाएं झूमने लगा। किसी की आंखे नम थी तो कोई अपने भाव में डूबा हुआ था और यमुना का अरैल घाट, त्रिवेणी संगम और अक्षयवट इस दुर्लभ क्षण के गवाह बन रहे थे।

“मानस अक्षयवट” में विविध संस्कृतियों का समागम

मोरारीबापू की राम कथा में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, बिहार, दिल्ली सहित देश – विदेश के विभिन्न हिस्सों से आए श्रोता “मानस अक्षयवट” का आनंद रस लूट रहे हैं। वहीं प्रयागराज के आसपास के गांवों से आने वाला भी जनसैलाब एम अनूठी संस्कृति का आभास करा रहा है। कथा में आने वाले श्रोताओं की बोली और पहनावा भी भारतीय संस्कृति के विविध रंगों का संगम करा रहा है। कहीं देवात की बोली कानों में गूंज रही हैं तो कहीं गुजराती, राजस्थानी और उत्तरप्रदेश की बोली प्रभु प्रसंगों की चर्चा का जरिया बनी हुई है। कथा से पूर्व आसपास के गांवों से लोगों के पहुंचने को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। दूर-दराज से लोग “मानस अक्षयवट” सुनने को पहुंच रहे हैं। कई निशक्तजन भी व्हील चैयर एवं अन्य शहरों से कथा श्रवण को आ रहे हैं। हर आयु वर्ग के लोग बापू की कथा का श्रवण कर रहे हैं।

यह रहे मौजूद

“मानस अक्षयवट” कथा अवसर पर कथा के मुख्य आयोजक  मदन पालीवाल, रविन्द्र जोशी, रूपेश व्यास,विकास पुरोहित ,प्रकाश पुरोहित, मंत्रराज पालीवाल, सतुआ बाबा सहित बड़ी संख्या में श्रोतागणों ने व्यासपीठ की आरती उतारी

यह रहेगी यातायात व्यवस्था

कथा में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अक्षय मेला घाट से सुबह 7 से शाम को 4:30 बजे तक निशुल्क नाव सुविधा रहेगी। संत कृपा सनातन संस्थान ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि नाव में बैठने से पूर्व लाइफ जैकेट पहने और एक बार में 10 से ज्यादा यात्री नहीं बैठे। इसके अलावा बस सुविधा में सुबह 7 बजे से परेड ग्राउंड और रेलवे स्टेशन गेट नम्बर 1, होटल स्वागतम से सुबह 7 से शाम 5 बजे तक निशुल्क 50 बसे लगाई गई है।

व्यासपीठ पर कीजिए बेटियों के हाथ पीले

मोरारीबापू की ईच्छा के अनुरूप संतकृपा सनातन संस्थान, नाथद्वारा की ओर से  7 मार्च को होने वाले सामूहिक विवाह को लेकर पंजीयन शुरू हो चुके हैं। इसमें निर्धन परिवार की बेटियों की शादी करवाई जाएगी, चाहे वह किसी भी धर्म और जाति के हो। व्यासपीठ से मोरारीबापू के आव्हान के बाद सामुहिक विवाह में दोनों पक्षों के लिए बेटी-बेटे की शादी की आवश्यक तैयारी, भोजन, उपहार सभी की व्यवस्था संत कृपा सनातन संस्थान, नाथद्वारा करेगा। इसके लिए आयोजन स्थल पर स्थित कार्यालय पर सम्पर्क किया जा सकता है